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Allahabad High Court

SANDEEP KUMARversusSTATE OF U.P.

Decided

Holding

The court held that, given the seriousness of the allegations and the lack of merit in the bail petition, bail could not be granted and the application was dismissed.

Summary

The High Court of Allahabad considered a bail application filed by Sandeep Kumar, who was arrested under sections 61(2), 115(2), 351(2), 352 and 69 of the Indian Penal Code for alleged sexual assault and related offences. The applicant's counsel argued that the FIR was false, delayed, and motivated by a long‑standing family feud, asserting the applicant's innocence and lack of criminal record. The prosecution counsel countered with the victim's statements and medical report, describing the alleged acts as serious and heinous. Applying established bail principles, the court examined the gravity of the accusations, the credibility of the victim's testimony, and the potential for misuse of the process. Concluding that the bail petition lacked merit and the offences were of a serious nature, the court rejected the application and ordered the bail petition to be dismissed.

Issues considered

  • Whether the applicant is entitled to bail in view of the alleged offences under IPC sections 61(2), 115(2), 351(2), 352 and 69.
  • Whether the seriousness of the allegations and the credibility of the victim's statements justify denial of bail.

Legislation cited

Subjects

  • bail
  • criminal procedure
  • Indian Penal Code
  • sexual assault
  • false accusation
  • marriage fraud

Judgment

          HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
          CRIMINAL MISC. BAIL APPLICATION No. - 9260 of 2026

Sandeep Kumar
                                                                     .....Applicant(s)
                                        Versus

State of U.P.
                                                                         .....Opposite
                                                                               Party(s)

Counsel for Applicant(s)                         :   Hemant Kumar Dubey
Counsel for Opposite Party(s)                    :   G.A.

Court No. - 65
                 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.

1. सूची पुनरीक्षित वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्ण जमानत प्रार्थना पत्र आवेदक संदीप कुमार की ओर
से मु०अ०सं० 562/2025, अन्तर्गत धारा धारा-61(2)/ 115(2)/ 351(2)/ 352/ 69
बी.एऩ.एस. थाना- गौरी बाजार, जिला देवरिया में जमानत पर मुक्त करने हेतु प्रस्तुत किया गया
है।


2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता श्री चन्दन सिंह को सुना
तथा पत्रावली का परिशीलन किया।


3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि आवेदक को इस प्रकरण में गलत एवं
फर्जी ढंग से झूठा फंसाया गया है, उसने कथित अपराध कारित नहीं किया है। प्रथम सूचना
रिपोर्ट तथाकथित घटना से लगभग 3 माह पश्चात पंजीकृत करायी गयी है, लेकिन देरी का कोई
स्पष्ट कारण प्रथम सूचना रिपोर्ट में दर्ज नहीं है। अभियोजन पक्ष के अनुसार उक्त मामले की
तथाकथित पीड़िता के पति की मृत्यु लगभग 4 वर्ष से अधिक समय पूर्व हो चुकी है।
तथाकथित पीड़िता के दो बच्चे है एवम् पहली बार आवेदक द्वारा जबरजस्ती कब शारीरिक
संबंध बनाया गया इस बात का प्रथम सूचना रिपोर्ट में कोई उल्लेख नहीं है। आवेदक द्वारा
तथाकथित पीड़िता को मुम्बई ले जाना व शारीरिक संबंध बनाने की बात प्रथम सूचना रिपोर्ट में
कही गयी है, लेकिन किस तिथि व समय पर आवेदक तथाकथित पीड़िता को मुम्बई ले गया
एवम् मुम्बई में किस स्थान पर कितने दिनों तक रखा व कितनी बार संबंध बनाया इस बात का
प्रथम सूचना रिपोर्ट में कही भी उल्लेख नहीं है। आवेदक द्वारा दिनांक 25.09.2025 को
शारीरिक संबंध बनाने की बात कही गयी है, लेकिन जबरन संबंध बनाने की बात नहीं कही गयी
है। इस प्रकार प्रथम सूचना रिपोर्ट की संपूर्ण कहानी स्वयं में संदेहास्पद प्रतीत होती है।
वास्तविकता यह है कि वादिनी मुकदमा व आवेदकएक ही गांव के है व तथाकथित पीड़िता के
परिवार से आवेदक के परिवार के मध्य काफी पुराने समय से जमीनी रंजिश चला आ रहा है।
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जिससे रंज होकर फर्जी व नुमाइशी कहानी के आधार पर उक्त अभियोग पंजीकृत करा दिया
गया। जिसकी वास्तविकता से कोई वास्ता सरोकार नहीं है। वादिनी मुकदमा आवेदक से
लगभग 15 वर्ष से अधिक बड़ी है इस प्रकार प्रार्थी द्वारा कदापि उक्त अपराध कारित किया
जाना संभव नहीं है तथाकथित पीड़िता रिश्ते में आवेदक की चाची लगती है जिनका दर्जा माँ के
समान होता है एवम् जिससे यह स्पष्ट है कि आवेदक़ द्वारा उक्त अपराध कारित नहीं किया गया
है। वादिनी मुकदमा द्वारा आवेदक की जमीनों को हड़पने का यथासंभव प्रयास किया जाता रहा
है, लेकिन अपने मंसूबे में सफल न होने पर फर्जी मनगढ़न्त बनावटी व नुमाइशी कहानी तैयार
कर उक्त अभियोग पंजीकृत करा दिया गया है। आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
पुनः उनका कथन है कि आवेदक की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि वह कानून की
प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए तैयार है और जब भी आवश्यकता होगी वह ईमानदारी से
अदालत के समक्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन सभी शर्तों को स्वीकार करने के लिए भी
तैयार है जो न्यायालय उस पर अधिरोपित करेगी। आवेदक निर्दोष है तथा वह इस प्रकरण में
दि० 20.12.2025 से कारागार में निरुद्ध है इसलिए आवेदक को जमानत पर छोड़ दिया
जाय।


4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने अभियुक्त के जमानत का प्रबल विरोध करते हुए तर्क
प्रस्तुत किया कि 4. पीड़िता ने अपने धारा 183 बी.एन.एस. के बयान में कथन किया कि मेरे
गांव का संदीप पुत्र पप्पु ने मुझे कहा कि वो मुझसे शादी करेगा। संदीप के मा-बाप भी बोले की
वो मेरी शादी संदीप से करा देंगे। संदीप ने मुझे शादी का झांसा देकर मेरे साथ शारीरिक संबंध
बनाया। गांव में भी कई बार संबंध बनाया। फिर मुझे डेढ़ साल पहले देवरिया लेकर आया। यहाँ
भी कई बार शारीरिक संबंध बनाया। अब संदीप और उसके माता-पिता शादी नहीं कर रहे हैं।
मना कर दिया है। मुझे मार्च में संदीप बम्बई लेकर आया। फिर ढाई माह बाद मुझे देवरिया ले
आया। बम्बई में भी शारीरिक संबंध बनाया। मुझे देवरिया लाकर फिर शारीरि संबंध बनाया।
बोला की मेरे आधार कार्ड गाँव छू ट गया है। देवरिया में ही कोर्ट मैरिज हो जायेगा। शादी नहीं
किया। मुझे कोतवाली रोड पर ले जाकर मुझे धक्का देकर भाग गया। फोन से धमकी दे रहा है
कि कहीं जाओगी तो तुमको और तुम्हारे बच्चों को जान से मार देंगे।" तथा पीड़िता ने अपने
मेडिकल प्रपत्र में भी कथन किया कि आवेदक/अभियुक्त द्वारा पीड़िता को शादी का झाँसा देकर
पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाये जाने तथा पीड़िता ने अपनी अंदरुनी जांच करवाये जाने
का कथन किया है। आवेदक द्वारा कारित अपराध गंभीर व जघन्य प्रकृति का है। इसलिए,
अभियुक्त को जमानत पर पर न छोड़ा जाय।


5. वर्तमान मामले में जमानत संबंधी विधि के स्थापित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए एवं उभय
पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं के कथनों, आरोपों की प्रकृति, आवेदक की भूमिका और इस
मामलें के इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गुण-दोष पर बिना कोई विचार व्यक्त किए यह
जमानत आवेदन पत्र स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अतः यह जमानत आवेदन पत्र
                                                                                             BAIL No. 9260 of 2026
                                                                      3

                                    अस्वीकार किया जाता है।


                                    6. तद्नुसार, यह जमानत आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।


                                                                                     (Dr. Gautam Chowdhary,J.)
                                    March 18, 2026
                                    S.Mishra




Digitally signed by :-
SHASHI MISHRA
High Court of Judicature at Allahabad


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