Allahabad High Court
GAGAN SINGH THAPAversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The court granted bail to the applicant with specified conditions.
Summary
The applicant, Gagan Singh Thapa, sought bail in a criminal case (Mu. A. No. 36/2026) under Section 69 of the B.N.S., alleging that the FIR was lodged belatedly and was based on false accusations of sexual relations and non‑marriage. The petitioner’s counsel argued that the alleged acts were consensual, the complainant was an adult widow with no prior complaints, and there were no independent witnesses, rendering the charges spurious. The opposing counsel contended that the alleged offence was cognizable and serious, warranting denial of bail. The court examined the material on record, noted the absence of concrete opposing evidence and the risk of tampering, and concluded that bail could be granted subject to strict conditions. Accordingly, the court released the applicant on bail with five conditions relating to non‑interference with evidence, non‑threatening of witnesses, compliance with court orders, and abstention from further criminal activity.
Issues considered
- Whether the applicant is entitled to bail under Section 69 of the B.N.S. given the nature of the alleged offence.
- Whether the alleged conduct constitutes a cognizable and serious offence justifying denial of bail.
- Whether the lack of independent witnesses and alleged false FIR affect the bail decision.
Legislation cited
- B.N.S. — s. 180, 183, 69
Subjects
- bail
- false accusation
- consent
- Section 69
- Section 180
- Section 183
- high court
- criminal procedure
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
CRIMINAL MISC. BAIL APPLICATION No. - 9426 of 2026
Gagan Singh Thapa
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P. and Another
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Rajendra Kumar Pandey, Smt. Kirti
Pandey
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.
Court No. - 65
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. सूची पुनरीक्षित वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्ण जमानत प्रार्थना पत्र, आवेदक गगन सिंह थापा की
ओर से मु०अ०सं०-36/2026 धारा-69,352 बी.एऩ.एस. थाना- विजयनगर, जिला गाजियाबाद
में जमानत पर मुक्त करने हेतु प्रस्तुत किया गया है।
2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली का
परिशीलन किया।
3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि आवेदक को इस प्रकरण में गलत एवं
फर्जी ढंग से झूठा फंसाया गया है, उसने कथित अपराध कारित नहीं किया है। प्रथम सूचना रिपोर्ट
विलम्ब से दर्ज करायी गयी विलम्ब का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उक्त घटना का कोई
स्वतंत्र साक्षी नही है। आवेदक के विद्वान अधिवक्ता का कथन है कि पीड़िता द्वारा एफआईआर
में और साथ ही धारा 180 और 183 बी.एन.एस.एस. के बयानों में पीड़िता ने आवेदक के
खिलाफ आरोप लगाया है कि वह उसके साथ शादी के बहाने कई बार यौन संबंध स्थापित
किए, उसके बाद भी उसने उससे शादी नहीं की और बराबर शादी से इनकार करता रहा।
उन्होंने आगे यह भी कथन किया कि पीड़िता एक विधवा, तीन बच्चों की मां है जोकि पूर्णतः
एक वयस्क महिला है। पीडिता द्वारा अंतर्गत धारा 183 बी.एन.एस.एस. के बयान में यह स्पष्ट
कथन किया गया है कि वह आवेदक के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थी। पीड़िता के
उक्त बयानों के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़िता, आवेदक के साथ संबंध में थी
और उनके बीच जो भी यौन संबंध विकसित हुए थे, वे सहमति से थे, इस प्रकार, बी.एन.एस.
की धारा 69 का आरोप आवेदक पर नहीं बनता है। क्योंकि वे नवम्बर 2023 से एक लंबी
अवधि से संबंध में थे और इस संबंध में पीड़िता द्वारा कोई पूर्व शिकायत नहीं की गई है,
इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि आवेदक को झूठे और तुच्छ आरोपों और दुर्भावनापूर्ण इरादे से
मामले में फंसाया गया है। पुनः उनका कथन है कि आवेदक की ओर से यह आश्वासन दिया गया
है कि वह कानून की प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए तैयार है और जब भी आवश्यकता होगी वह
ईमानदारी से अदालत के समक्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन सभी शतों को स्वीकार करने
BAIL No. 9426 of 2026
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के लिए भी तैयार है जो न्यायालय उस पर अधिरोपित करेगी। आवेदक निर्दोष है तथा वह इस
प्रकरण में दि० 05.02.2026 से कारागार में निरुद्ध है इसलिए आवेदक को जमानत पर छोड़
दिया जाय।
4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने आवेदक के विद्वान अधिवक्ता के तर्को का प्रबल विरोध
करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि आवेदक द्वारा कारित अपराध संज्ञेय एवं गंम्भीर प्रकृति का है,
इसलिए आवेदक को जमानत पर न छोड़ा जाये।
5. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों के परिप्रेक्ष्य प्रश्नगत प्रकरण में पत्रावली पर उपलब्ध
सारवान तथ्यों एवं परिस्थितियों का समग्र रूप से अवलोकन करने के बाद, सबूतों की प्रकृति और
किसी भी ठोस विरोधात्मक सामग्री की अनुपस्थिति एवं उपलब्ध सामग्री से छे ड़छाड़ की संभावना
न होने के तथ्य को देखते हुए मेरी राय में आवेदक को जमानत पर मुक्त करने का उपयुक्त आधार
है।
6. अतः वाद के गुण दोष पर बिना कोई टिप्पणी किए हुए आवेदक को उपरोक्त वर्णित अपराध में
संबंधित न्यायालय की सन्तुष्टि पर व्यक्तिगत बंध-पत्र एवं अधिक धनराशि के दो स्थानीय प्रतिभू
प्रस्तुत करने पर निम्नलिखित शर्तों के साथ जमानत पर छोड़ दिया जाय।
1. आवेदक विवेचना या परीक्षण के दौरान अभियोजन साक्ष्यों के साथ छे ड़छाड़ नहीं करेगा।
2. आवेदक अभियोजन साक्षियों व पीड़िता/ शिकायतकर्ता को डरायेगा/धमकायेगा नहीं।
3. आवेदक न्यायालय के आदेशों का पालन करेगा, वह परीक्षण के दौरान बिना कोई
अनावश्यक स्थगन लिए नियत तिथि पर न्यायालय में उपस्थित होगा तथा परीक्षण में
ईमानदारी से सहयोग करेगा।
4. आवेदक जमानत पर रिहा होने के बाद जमानत की स्वतंत्रता का दुरूपयोग नही करेगा और
किसी भी अपराधिक गतिविधि में लिप्त नहीं होगा न कोई अपराधिक कृत्य करेगा।
5. आवेदक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति या पुलिस
अधिकारियों को कोई प्रलोभन या धमकी नहीं देगा न ही उनसे कोई वायदा करेगा, जिसके
कारण उन्हें न्यायालय में तथ्यों को उजागर करने से विरत रहना पडे।़
उपरोक्त शर्तों में से किसी के उल्लंघन के मामले में, परीक्षण न्यायालय आवेदक की जमानत
नियमानुसार रद्द करने को स्वतंत्र है।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
March 19, 2026
S.Mishra
Digitally signed by :-
SHASHI MISHRA
High Court of Judicature at Allahabad
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