Created by Fuzzy Cloud

Allahabad High Court

PRIYANK @ PRIYANKESH JAIN AND 3 OTHERSversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER

Decided

Holding

The Court held that the magistrate’s order under Section 528 BNSS stands as there is sufficient material to justify continuation of the proceedings, and no mini‑trial is required at this stage.

Summary

The applicants filed an application under Section 528 of the Bharatiya Nagrik Suraksha Sanhita (BNSS) seeking quash of the charge sheet, notice and inquiry order in a criminal case (State vs. Priyankesh Jain and others). They alleged that the prosecution was maliciously fabricated and that no prima facie offence existed. The State opposed, contending that the magistrate’s order was based on a preliminary assessment of the material on record and that a mini‑trial is not required at this stage. The Court examined precedents such as S.W. Palanitkar v. State of Bihar, Nupur Talwar v. CBI and Muskan v. Ishaan Khan, holding that the test at the Section 528 stage is whether there is sufficient basis to continue the proceeding, not whether guilt is proved. Finding that the material on record could support continuation of the case, the Court declined to set aside the magistrate’s order and dismissed the application.

Issues considered

  • Whether the magistrate’s order under Section 528 BNSS can be set aside without a mini‑trial.
  • Whether the material on record shows sufficient basis to continue the criminal proceeding.
  • Scope of the court’s power under Section 528 BNSS in view of the principles laid down in Section 482 CrPC.
  • Whether the applicants’ claim of false framing is a factual issue requiring evidentiary determination.

Legislation cited

Subjects

  • Section 528 BNSS
  • quash petition
  • mini trial
  • sufficient evidence
  • criminal procedure
  • jurisdiction
  • false framing

Judgment

           HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
                 APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 35901 of 2026

Priyank @ Priyankesh Jain And 3 Others
                                                                      .....Applicant(s)
                                         Versus

State of U.P. and Another
                                                                           .....Opposite
                                                                                 Party(s)

Counsel for Applicant(s)                           :    Raj Kumar Tripathi
Counsel for Opposite Party(s)                      :    G.A.

Court No. - 79
                   HON'BLE SAURABH SRIVASTAVA, J.

1. आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता श्री राज कुमार त्रिपाठी एवं राज्य की तरफ से विद्वान अपर
शासकीय अधिवक्ता को सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।

2. आवेदकगण की ओर से धारा 528 बी.एऩ.एस.एस. के अन्तर्गत यह आवेदन पत्र,
मु०अ०सं० 87/2025 से उद्भूत वाद सं० 4880/2026 (State vs. Priyankesh Jain and
others), अन्तर्गत धारा 303(2), 318(4) बी.एन.एस., थाना सिकन्दरा, जिला आगरा, जो
विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, आगरा के न्यायालय में लम्बित है, में प्रेषित आरोपपत्र सं०
368/2025, दिनांकित 18.09.2025 एवं प्रसंज्ञान/तलबी आदेश दिनांकित 25.03.2026
की सम्पूर्ण कार्यवाही को अपास्त किये जाने हेतु योजित किया गया है।

3. आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि विपक्षी संख्या-2 की
दुर्भावनापूर्ण मंशा एवं कुत्सित उद्देश्य के कारण आवेदकगण को वर्तमान प्रकरण में झूठा
फंसाया गया है। अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के अवलोकन से उपर्युक्त धाराओं के
अंतर्गत आवेदकगण के विरुद्ध दंडनीय कोई अपराध प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं होता है।
सूचनाकर्ता कम्पनी जूतों की निर्माता कम्पनी है तथा उक्त कम्पनी अपने निर्मित जूतों की
आपूर्ति Flipkart के माध्यम से करती है, जो उक्त वस्तुओं की बिक्री हेतु एक ऑनलाइन
विक्रय मंच के रूप में कार्य करता है। आवेदक संख्या 1 एवं 2, जो ग्लैम लॉजिस्टिक्स के स्वामी
एवं प्रबंधक हैं तथा सूचनाकर्ता द्वारा आपूर्ति किए गए माल का वितरण फ्लिपकार्ट के
वेयरहाउस से प्राप्त निर्देशों के अनुसार ग्राहकों तक करते हैं।आवेदक संख्या 1 एवं 2 का
सूचनाकर्ता/कम्पनी से किसी भी प्रकार का कोई सरोकार, संबंध अथवा संबद्धता नहीं है।
आवेदक संख्या 3 एवं 4 फ्लिपकार्ट के आगरा स्थित वेयरहाउस के मात्र कर्मचारी हैं तथा वे
अपने उच्चाधिकारियों द्वारा दिए गए आदेशों एवं निर्देशों के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन
करते हैं। सूचनाकर्ता कम्पनी से प्राप्त स्टॉक के प्रबंधन अथवा उसके संबंध में लिए जाने वाले
                                                                 NA528 No. 35901 of 2026
                                     2


किसी भी निर्णय में आवेदक संख्या 3 एवं 4 की कोई भूमिका नहीं है। आवेदक के विद्वान
अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि उर्पयुक्त मामलें में विचारण न्यायालय द्वारा आक्षेपित आदेश
पारित करते समय न तो साक्ष्यों की कोई विवेचना की गई और न ही इस पर विचार किया गया
कि आवेदकगण द्वारा कथित रूप से क्या कृत्य किया गया था। अतः आक्षेपित संज्ञान आदेश
एवं आरोप-पत्र निरस्त एवं अपास्त किए जाने योग्य हैं।

4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता द्वारा आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत तर्कों
का खंडन करते हुए कथन किया गया कि आवेदकगण की ओर से उठाए गए तर्क विवादित
तथ्य के प्रश्नों से संबंधित हैं तथा उनके निर्धारण हेतु साक्ष्यों का मूल्यांकन आवश्यक होगा।
प्रश्नगत मामलें में समुचित विवेचना के उपरांत विचारण न्यायालय द्वारा पर्याप्त आधार पर
प्रश्नगत आदेश पारित किया है, जिसमें कोई विधिक अथवा क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि परिलक्षित
नहीं हो रही है। यह भी प्रस्तुत किया गया कि संज्ञान ग्रहण किए जाने के स्तर पर न्यायालय को
केवल प्रथमदृष्टया प्रकरण की विद्यमानता पर विचार करना होता है और संबंधित विचारण
न्यायालय से लघु विचारण (मिनी ट्रायल) किए जाने की अपेक्षा नहीं की जाती है।

5. आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत तर्कों को
सुनने तथा अभिलेख का परिशीलन करने के पश्चात न्यायालय का मत है कि तलबी आदेश जारी
किए जाते समय संबंधित मजिस्ट्रेट को अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर मात्र
प्रथमदृष्टया राय अभिलिखित करनी होती है और उससे लघु विचारण (मिनी ट्रायल) करने
अथवा अभियुक्त के बचाव पक्ष का परीक्षण करने की अपेक्षा नहीं की जाती है। माननीय
उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत S.W. Palanitkar and Others Vs. State of Bihar
and Another; (2002) 1 SCC 241 में प्रतिपादित किया गया है कि इस स्तर पर लागू
किया जाने वाला परीक्षण यह है कि क्या कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए "पर्याप्त आधार"
विद्यमान है, न कि यह, कि क्या दोषसिद्धि के लिए "पर्याप्त आधार" विद्यमान है। इसी प्रकार
Nupur Talwar Vs. Central Bureau of Investigation and Another;
(2012) 11 SCC 465 के मामले में यह पुनः प्रतिपादित किया गया कि प्रक्रिया जारी किए
जाने के स्तर पर साक्ष्यों पर विचार का उद्देश्य सीमित एवं अस्थायी प्रकृति का होता है, जो
विचारण के दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले वास्तविक साक्ष्य से भिन्न है। इस स्तर पर यह
परीक्षण किया जाना है कि क्या मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत सामग्री "अभियुक्त के विरुद्ध
कार्यवाही किए जाने के लिए पर्याप्त" है, न कि यह, कि क्या वह "दोष सिद्ध एवं स्थापित करने
के लिए पर्याप्त" है।

6. हाल ही में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत Criminal Appeal No. 4752 of
2025 (arising out of S.L.P. (Criminal) No. 1531 of 2025) में पारित
Muskan Vs. Ishaan Khan (Sataniya) and others के निर्णय में यह प्रतिपादित
                                                                                                     NA528 No. 35901 of 2026
                                                                          3


                                    किया गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत न्यायालय की शक्तियों के संबंध
                                    में यह स्थापित विधि है कि कार्यवाही निरस्त किए जाने के चरण पर न्यायालय से लघु विचारण
                                    (मिनी ट्रायल) करने की अपेक्षा नहीं की जाती है। अतः धारा 482 दं.प्र.सं. के अंतर्गत
                                    निरस्तीकरण के संबंध में न्यायालय का क्षेत्राधिकार कुछ सीमा तक सीमित है और न्यायालय
                                    को केवल इस बात पर विचार करना होता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही आगे बढ़ाने हेतु
                                    कोई पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध है अथवा नहीं। यदि पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध है, तो धारा 482 के
                                    अंतर्गत शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

                                    7. पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों के अवलोकन से इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि
                                    आवेदकगण के विरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। आवेदकगण द्वारा किए गए झूठे फंसाए जाने
                                    के कथन तथ्यात्मक प्रश्न हैं, जिनका समुचित निराकरण विचारण न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के
                                    आधार पर किया जाना आवश्यक है तथा धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत कार्यवाही में
                                    उनका निर्णायक रूप से निर्धारण नहीं किया जा सकता। धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत
                                    कार्यवाही में यह न्यायालय लघु विचारण (मिनी ट्रायल) करने के पक्ष में नहीं है।

                                    8. यह विधि का सुस्थापित सिद्धांत है कि धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत निहित
                                    शक्तियों का प्रयोग अत्यंत संयम एवं सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, मुख्यतः न्यायालय
                                    की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने अथवा न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए।
                                    वर्तमान प्रकरण में धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत इस न्यायालय के असाधारण
                                    क्षेत्राधिकार का प्रयोग किए जाने हेतु कोई पर्याप्त आधार परिलक्षित नहीं हो रहा है तथा विद्वान
                                    विचारण न्यायालय द्वारा पारित प्रश्नगत आदेश सकारण एवं उचित आदेश है तथा उसमें कोई
                                    विधिक त्रुटि नहीं है।

                                    9. तद्नुसार, आवेदकगण की ओर से धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत
                                    प्रस्तुत यह आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।



                                                                                                 (Saurabh Srivastava,J.)
                                    September 29, 2026
                                    Pawan Kumar




Digitally signed by :-
PAWAN KUMAR
High Court of Judicature at Allahabad


Continue reading with your account

Sign in to read the full judgment. It’s free.

Sign in to read

Checking your session…

For a signed copy suitable for filing, refer to the court's website.