Allahabad High Court
VIJAY KUMAR SINGHversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The court held that a prima facie case exists and the application under Section 528 cannot be entertained, thereby dismissing it.
Summary
Vijay Kumar Singh filed an application under Section 528 of the BNSS seeking to quash criminal proceedings (IPC sections 419, 420, 406, 467, 468, 471, 120B and IT Act section 66D) that arose from FIR No. 0718/2021. He contended that no offence was made out, the prosecution was malicious, the FIR was lodged after a seven‑month delay and the disputed money was never credited to his account, arguing that the matter was essentially civil. The State opposed, stating that a charge‑sheet had been filed and the lower court had validly passed an order. The High Court examined the submissions, held that a prima facie case existed and, relying on several Supreme Court precedents, rejected the application, ordering its dismissal.
Issues considered
- Whether the application under Section 528 of the BNSS for quashing the criminal proceedings can be entertained.
- Whether a prima facie case exists against the applicant under the charged offences.
- Whether the prosecution is malicious and intended to harass the applicant.
Legislation cited
- B.N.N.S. — s. 528
- Indian Penal Code — s. 120B, 406, 419, 420, 467, 468, 471
- Information Technology Act — s. 66D
Subjects
- Section 528
- quash of criminal proceedings
- prima facie case
- malicious prosecution
- High Court of Allahabad
- IPC offences
- IT Act
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 36074 of 2026
Vijay Kumar Singh
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P. and Another
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Harishchandra Yadav, Mudit Agnihotri
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय सुरक्षा संहिता के अंतर्गत यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं०
0718/2021, अंतर्गत धारा 419, 420, 406, 467, 468, 471, 120बी भारतीय दण्ड
संहिता व धारा 66डी आई.टी. एक्ट, थाना कोतवाली, जिला देवरिया में प्रेषित आरोप पत्र,
दिनांकित 04.07.2023 से उद्भूत वाद सं० 9516/2023 (State VS. Vijay Kumar
Singh and Another) में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट,-17, देवरिया द्वारा पारित प्रसंज्ञान/तलबी
आदेश दि० 20.07.2023 तथा इस वाद की संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त करने हेतु योजित किया
गया है।
2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली का
परिशीलन किया।
3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध प्रकट नहीं होता है
और वर्तमान अभियोजन दुर्भावनापूर्ण इरादे से उत्पीड़न करने के उद्देश्य से संस्थित किया गया है।
यहां प्रासंगिक है किल प्रथम सूचना रिपोर्ट सात माह उपरांत पंजीकृत कराया गया तथा कथित
विवादित धनराशि आवेदक के खाते में प्राप्त नहीं हुआ हुई है। उल्लेखनीय है कि उभय पक्षों के
मध्य दिवानी प्रकृति का विवाद है। पुनः उनके द्वारा अपने तर्क के समर्थन में कुछ दस्तावेजों और
बयानों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने कथन किया कि प्रश्नगत मामलें में समुचित विवेचना के
उपरांत अभियुक्त के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है तथा उस पर संबंधित विचारण
न्यायालय द्वारा पर्याप्त आधार पर प्रश्नगत आदेश पारित किया है तथा अभियुक्त के विद्वान
अधिवक्ता द्वारा प्रश्नगत आदेश को अपास्त करने हेतु जो तर्क प्रस्तुत किए गए वे बलहीन है।
5. इस चरण पर, आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उठाए गए तर्क में तथ्यात्मक विवाद का
न्यायिक निर्णय (adjudication) और साक्ष्य का मूल्यांकन (appraisal) शामिल है।
6. उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों एवं अभिलेख पर मौजूद सामग्री के अवलोकन से और
इस चरण पर मामले के तथ्यों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदक के विरुद्ध कोई
अपराध नहीं बनता है। बार (न्यायालय) के समक्ष किए गए सभी अभिवचन (submissions)
तथ्य के विवादित प्रश्नों से संबंधित हैं, जिनका इस न्यायालय द्वारा धारा 528 बी.एन.एन.एस. के
NA528 No. 36074 of 2026
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अंतर्गत न्यायिक निर्णय नहीं किया जा सकता है। इस चरण पर केवल प्रथम दृष्टया (prima
facie) मामला देखा जाना है, जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आर.पी. कपूर बनाम
पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1960 एस.सी. 866, हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल, 1992
एससीसी (क्रिमिनल) 426, बिहार राज्य बनाम पी.पी. शर्मा, 1992 एससीसी (क्रिमिनल)
192 और अंत में झंडू फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड बनाम मोहम्मद शराफुल हक एवं अन्य
(पैरा-10) 2005 एससीसी (क्रिमिनल) 283 के मामलों में प्रतिपादित कानून के आलोक में स्पष्ट
किया गया है। इसलिए, इस मामले की संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त करने की प्रार्थना को
अस्वीकार किया जाता है।
7. तद्नुसार, यह आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।
8. कार्यालय को निर्देश दिया जाता है कि इस आदेश की एक प्रतिलिपि संबंधित अवर न्यायालय
को अविलम्ब भेजना सुनिश्चित किया जाय।
9. यदि इस वाद में कोई अंतरिम आदेश हो तो, उसे समाप्त समझा जाय।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
September 8, 2026
CP.sahani
Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad
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