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Allahabad High Court

RAKESH KUMAR BINDversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER

Decided

Holding

The Court held that a prima facie case of offence exists and therefore the application under Section 528 CrPC seeking to set aside the order was dismissed.

Summary

The applicant, Rakesh Kumar Bind, filed an application under Section 528 of the Criminal Procedure Code seeking to set aside a order dated 25‑11‑2025 passed by a Civil Judge in a case under the Uttar Pradesh Gauvandhan Nivaran Act. The applicant contended that no offence was made out as all eight animals were rescued alive, with no evidence of killing and the only alleged confession being inadmissible. The State argued that a charge‑sheet had been filed and the order was based on sufficient material. The Court observed that the matter involved factual disputes and that a prima facie case must be established before a Section 528 application can be entertained, citing several Supreme Court precedents. Finding that a prima facie case of offence existed, the Court dismissed the application. The order directing the lower court’s decision to stand was affirmed.

Issues considered

  • Whether the order of the Civil Judge can be set aside under Section 528 CrPC in the absence of a prima facie case of offence.
  • Whether the prosecution under Sections 3,5A,5B,8 of the Uttar Pradesh Gauvandhan Nivaran Act is maintainable given the alleged lack of evidence of animal killing.
  • Whether the oral confession alleged by the applicant is admissible as evidence.

Legislation cited

Subjects

  • Section 528 CrPC
  • prima facie case
  • Uttar Pradesh Gauvandhan Nivaran Act
  • animal protection
  • evidence admissibility
  • application dismissed

Judgment

          HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
                 APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 36134 of 2026

Rakesh Kumar Bind
                                                                      .....Applicant(s)
                                        Versus

State of U.P. and Another
                                                                          .....Opposite
                                                                                Party(s)

Counsel for Applicant(s)      : Neeraj              Kumar       Srivastava,     Pankaj
                                Kumar
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.

Court No. - 75
                 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.

1. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय सुरक्षा संहिता के अंतर्गत यह आवेदन पत्र,
मु०अ०सं० 87/2025 अन्तर्गत धारा 3/5ए/5बी/8 गौहत्या निवारण अधिनियम उ०प्र०, थाना
कन्द्वा, जिला चंदौली में दाखिल आरोप पत्र, दिनांकित 19.11.2025 से उद्भूत वाद सं०
11450/2025 (राज्य बनाम कुमार बिन्द) में सिविल न्यायाधीश (जे०डी०) द्वारा पारित
प्रसंज्ञान/आदेश दिनांक 25.11.2025 को अपास्त करने हेतु योजित किया गया है।

2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली
का परिशीलन किया।

3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध प्रकट नहीं होता
है और वर्तमान अभियोजन दुर्भावनापूर्ण इरादे से उत्पीड़न करने के उद्देश्य से संस्थित किया
गया है। यहां प्रासंगिक है कि वर्तमान मामले में किसी प्रकार के वध, या वध के प्रयास का न तो
कोई आरोप है और न ही कोई निष्कर्ष पाया गया है। सभी 08 पशुओं को जीवित और स्वस्थ
बरामद किया गया था, जिनमें से 07 को जीवित अवस्था में एक मान्यता प्राप्त गौशाला को
सौंप दिया गया, तथा आठवें पशु की पुलिस हिरासत में प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हो गई। उत्तर
प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की धारा-8 के साथ पठित धारा-3 गोवध को दंडनीय
बनाती है, और संपूर्ण केस डायरी में ऐसा एक भी साक्ष्य या सामग्री नहीं है जिससे यह दर्शित
होता हो कि किसी पशु का वध किया गया था या वध किया जा रहा था। आशय (intent) के
घटक पर एकमात्र सामग्री पुलिस के समक्ष दिया गया कथित मौखिक इकबालिया बयान (oral
confession) है, जो साक्ष्य में अग्राह्य (inadmissible) है। कथित बरामदगी का एक भी
स्वतंत्र सार्वजनिक साक्षी (independent public witness) नहीं है। पुनः उनके द्वारा अपने
तर्क के समर्थन में कुछ दस्तावेजों और बयानों की ओर ध्यान आकर्षित किया।

4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने कथन किया कि प्रश्नगत मामलें में समुचित विवेचना के
उपरांत अभियुक्त के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है तथा उस पर संबंधित विचारण
न्यायालय द्वारा पर्याप्त आधार पर प्रश्नगत आदेश पारित किया है तथा अभियुक्त के विद्वान
अधिवक्ता द्वारा प्रश्नगत आदेश को अपास्त करने हेतु जो तर्क प्रस्तुत किए गए वे बलहीन है।

5. इस चरण पर, आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उठाए गए तर्क में तथ्यात्मक विवाद का
                                                                                                  NA528 No. 36134 of 2026
                                                                        2


                                    न्यायिक निर्णय (adjudication) और साक्ष्य का मूल्यांकन (appraisal) शामिल है।

                                    6. उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों एवं अभिलेख पर मौजूद सामग्री के अवलोकन से
                                    और इस चरण पर मामले के तथ्यों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदक के
                                    विरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। बार (न्यायालय) के समक्ष किए गए सभी अभिवचन (
                                    submissions) तथ्य के विवादित प्रश्नों से संबंधित हैं, जिनका इस न्यायालय द्वारा धारा 528
                                    बी.एन.एन.एस. के अंतर्गत न्यायिक निर्णय नहीं किया जा सकता है। इस चरण पर केवल प्रथम
                                    दृष्टया (prima facie) मामला देखा जाना है, जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
                                    आर.पी. कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1960 एस.सी. 866, हरियाणा राज्य बनाम
                                    भजन लाल, 1992 एससीसी (क्रिमिनल) 426, बिहार राज्य बनाम पी.पी. शर्मा, 1992
                                    एससीसी (क्रिमिनल) 192 और अंत में झंडू फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड बनाम मोहम्मद
                                    शराफुल हक एवं अन्य (पैरा-10) 2005 एससीसी (क्रिमिनल) 283 के मामलों में प्रतिपादित
                                    कानून के आलोक में स्पष्ट किया गया है। इसलिए, इस मामले की संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त
                                    करने की प्रार्थना को अस्वीकार किया जाता है।

                                    7. तद्नुसार, यह आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।

                                    8. कार्यालय को निर्देश दिया जाता है कि इस आदेश की एक प्रतिलिपि संबंधित अवर
                                    न्यायालय को अविलम्ब भेजना सुनिश्चित किया जाय।

                                    9. यदि इस वाद में कोई अंतरिम आदेश हो तो, उसे समाप्त समझा जाय।



                                                                                        (Dr. Gautam Chowdhary,J.)
                                    September 8, 2026
                                    CP.sahani




Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad


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