Allahabad High Court
RAKESH DUBEYversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The application for discharge under Section 528 CrPC is dismissed as the case discloses a prima facie offence and factual disputes must be resolved by the trial court.
Summary
The applicant Rakesh Dubey filed an application under Section 528 of the Criminal Procedure Code seeking discharge of criminal proceedings initiated under the Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985. He alleged that the FIR and charge‑sheet mistakenly identified him, confusing his name with that of a habitual drug addict, Dinesh Kumar Upadhyay, and that the prosecution was malicious. The court examined the claim and noted that the identification dispute and other factual issues are matters of evidence to be decided by the trial court, not grounds for quashing at this stage. Citing precedents that a prima facie case suffices to continue proceedings, the court held that the application could not be entertained. Consequently, the application was dismissed and the matter was directed to the trial court for further trial.
Issues considered
- Whether an application under Section 528 CrPC for discharge of proceedings can be entertained when the allegations disclose a prima facie offence.
- Whether the alleged misidentification of the accused precludes continuation of the criminal trial.
- Whether the earlier dismissal of a discharge petition by the trial court bars the present application.
Legislation cited
Subjects
- Criminal Procedure Code
- Section 528
- NDPS Act
- misidentification
- prima facie case
- quash of proceedings
- discharge application
- trial court
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 41034 of 2026
Rakesh Dubey
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P. and Another
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Nikhil Kumar Yadav, Vagish Yadav
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय सुरक्षा संहिता के अंतर्गत यह आवेदन पत्र,
मु०अ०सं० 121/1997, अंतर्गत धारा 8/21 स्वापक औषधि और मनः प्रभावी पदार्थ
अधिनियम, थाना जैतपुरा, जिला वाराणसी में प्रेषित आरोप पत्र, दिनांकित 08.08.1997 से
उद्भूत दाण्डिक वाद सं० -पुराना/3003484 वर्ष 2012 (State U.P. Vs. Rakesh Kumar
Dubey), जो अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट सं० 8, वाराणसी द्वारा पारित तलबी आदेश
दि० 23.08.1997 तथा इस वाद की संपूर्ण कार्यवाही को अभिखण्डित करने हेतु योजित किया
गया है।
2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली
का परिशीलन किया।
3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध प्रकट नहीं होता
है और वर्तमान अभियोजन दुर्भावनापूर्ण इरादे से उत्पीड़न करने के उद्देश्य से संस्थित किया
गया है। यहां प्रासंगिक है कि इस मामलें को दिनांक 28.07.1997 को प्रथम सूचना रिपोर्ट
पंजीकृत की गई, जिसे केस क्राइम नंबर 121/1997, अंतर्गत धारा 8/21 स्वापक औषधि और
मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (Narcotic Drugs and Psychotropic
Substances Act, 1985), पुलिस थाना जैतपुरा, जिला वाराणसी में उसी तिथि की एक
घटना के संबंध में दर्ज किया गया था। इसमें यह आरोप लगाया गया कि उप-निरीक्षक (Sub-
Inspector) पुलिस श्री एन.के. ओझा, गश्त (patrolling) के दौरान, सूचना प्राप्त करते हैं
कि दो व्यक्ति नकी घाट क्रॉसिंग, मस्जिद के पास "हेरोइन" नामक नशीला पदार्थ बेच रहे हैं और
उक्त सूचना के आधार पर, श्री दिनेश कुमार उपाध्याय को श्री मुख्तार अहमद पुत्र इद्रीस अहमद
के साथ गिरफ्तार किया गया तथा श्री दिनेश कुमार उपाध्याय के कब्जे से एक माचिस में
हेरोइन बरामद होना बताया गया। तथापि, श्री दिनेश कुमार उपाध्याय, जो आवेदक के पड़ोसी
गांव के निवासी थे, एक आदतन मादक द्रव्य व्यसनी (drug addict) होने के साथ-साथ ड्रग
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पेडलर भी थे, लेकिन गिरफ्तारी के बाद पुलिस द्वारा पूछताछ किए जाने पर उन्होंने अपना नाम
राकेश कुमार दुबे उर्फ दिनेश कुमार पुत्र आद्या प्रसाद बताया और तदनुसार, बरामदगी मेमो और
गिरफ्तारी मेमो (arrest memo) तैयार किए गए, जिन्हें अंततः प्रथम सूचना रिपोर्ट में
परिवर्तित कर दिया गया। यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि श्री दिनेश कुमार उपाध्याय
को एन.डी.पी.एस. अधिनियम के तहत अपराध करते हुए कई बार गिरफ्तार किया गया था और
जब भी उन्हें गिरफ्तार किया गया, उन्होंने अपना नाम राकेश कुमार दुबे उर्फ दिनेश कुमार पुत्र
आद्या प्रसाद दुबे बताया। संयोगवश, आवेदक यानी राकेश दुबे का नाम वही है जो वास्तविक
आरोपी श्री दिनेश कुमार उपाध्याय द्वारा बताया गया था, किंतु आवेदक के पिता का नाम फूल
चंद दुबे है, जबकि दिनेश कुमार उपाध्याय ने यह दावा किया था कि उनके पिता का नाम आद्या
प्रसाद दुबे है। इस प्रसंग पर, आवेदक को उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट के अनुसरण में कभी भी
पुलिस द्वारा गिरफ्तार नहीं किया गया था, परंतु अनुसंधान अधिकारी ने, वास्तविक आरोपी श्री
दिनेश कुमार उपाध्याय पुत्र स्व. सरजू प्रसाद उपाध्याय की वास्तविक पहचान का सत्यापन
किए बिना, दिनांक 08.08.1997 को राकेश कुमार दुबे @ दिनेश कुमार पुत्र आद्या प्रसाद दुबे,
निवासी कंसराईपुर, थाना भदोही, जिला भदोही के नाम से आरोप-पत्र दाखिल कर दिया। श्री
राकेश कुमार दुबे उर्फ दिनेश कुमार को विद्वान सत्र न्यायाधीश द्वारा दिनांक 10.09.1997 के
आदेश से जमानत पर रिहा किया गया था, और दिनांक 10.09.1997 के उक्त आदेश के
अनुसरण में, जेल में एक रिहाई वारंट भेजा गया था, जहाँ से श्री दिनेश कुमार उपाध्याय को
रिहा किया गया था। आवेदक को न तो गिरफ्तार किया गया था, और न ही रिहा किया गया था।
दिनांक 10.09.1997 के आदेश द्वारा जेल से रिहा होने के बाद, वास्तविक आरोपी कभी भी
विचारण न्यायालय (Trial Court) के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ, जिसके कारण विचारण
न्यायालय को सम्मन (Summons), तदुपरांत जमानती वारंट (Bailable Warrants), गैर-
जमानती वारंट (Non-Bailable Warrants), और फिर मुचल्काधारकों (Sureties) को
नोटिस सहित बाध्यकारी उपाय (coercive measures) जारी करने पड़े। उपर्युक्त तथ्यों से
परिलक्षित हो रहा है कि आवेदक, वास्तव में वह व्यक्ति नहीं है, जो इस मामलें में मूल अपराधी
है। पुनः उनके द्वारा अपने तर्क के समर्थन में कुछ दस्तावेजों और बयानों की ओर ध्यान
आकर्षित किया।
4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने कथन किया कि इस मामलें आवेदक/अभियुक्त की ओर
से विचारण न्यायालय के समक्षय उन्मोचन प्रार्थना पत्र योजित किया गया है, जिसे विचारण
न्यायालय द्वारा गुण-दोष के आधार पर निरस्तारित किया जा चुका है। इसलिए, इस स्तर पर
वाछिंंत प्रार्थना स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
5. इस चरण पर, आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उठाए गए तर्क प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध
का बनना पाया गया है, जिसके आधार पर अन्वेषण अधिकारी द्वारा आरोप-पत्र प्रेषित किया
गया और संबंधित न्यायालय द्वारा संज्ञान लेते हुए तलबी आदेश पारित किया गया। अभियुक्त
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की पहचान, नाम में भिन्नता और अन्य तथ्यात्मक विवाद, जिनका उल्लेख आवेदक द्वारा किया
गया है, वे पूर्णतः साक्ष्य के प्रश्न (Questions of Fact) हैं, जिनका निर्धारण केवल विचारण
न्यायालय (Trial Court) के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने के उपरांत ही किया जा सकता
है। वर्तमान प्रकरण में अभियुक्त की पहचान का विवाद और पूर्व में उन्मोचन प्रार्थना पत्र का
निरस्त होना यह दर्शाता है कि इस स्तर पर समूची कार्यवाही को अभिखण्डित करना
न्यायसंगत नहीं है।
6. उपर्युक्त तथ्यात्मक एवं विधिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए, यह नहीं कहा जा सकता
कि आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। इस चरण पर केवल प्रथम दृष्टया (prima
facie) मामला देखा जाना है, जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आर.पी. कपूर बनाम
पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1960 एस.सी. 866, हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल, 1992
एससीसी (क्रिमिनल) 426, बिहार राज्य बनाम पी.पी. शर्मा, 1992 एससीसी (क्रिमिनल)
192 और अंत में झंडू फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड बनाम मोहम्मद शराफुल हक एवं अन्य
(पैरा-10) 2005 एससीसी (क्रिमिनल) 283 के मामलों में प्रतिपादित कानून के आलोक में
स्पष्ट किया गया है। इसलिए, इस मामले की संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त करने की प्रार्थना को
अस्वीकार किया जाता है।
7. तद्नुसार, यह आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।
8. कार्यालय को निर्देश दिया जाता है कि इस आदेश की एक प्रतिलिपि संबंधित अवर
न्यायालय को अविलम्ब भेजना सुनिश्चित किया जाय।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
September 24, 2026
CP.sahani
Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad
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