Allahabad High Court
AMIT TRIPATHI @ MUKUNDversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The court dismissed the application for discharge, holding that a prima facie case exists and the proceeding cannot be quashed under Section 528.
Summary
The applicant Amit Tripathi filed an application under Section 528 of the Code of Criminal Procedure seeking discharge of the criminal case State vs. Amit (Criminal Writ No. 71/2025) pending before the Additional District Judge, Allahabad. He contended that no offence was made out, the prosecution was malicious, and procedural requirements of the NDPS Act (sections 8, 20, 29) were not complied with. The State argued that a charge sheet had been filed on sufficient basis and the applicant's submissions were weak. The High Court examined the submissions, held that a prima facie case exists and that the matter cannot be disposed of under Section 528, relying on precedents such as R.P. Kapoor v. Punjab State and others. Consequently, the application for discharge was dismissed and the criminal proceeding allowed to continue.
Issues considered
- Whether the criminal proceeding should be discharged under Section 528 of the Code of Criminal Procedure.
- Whether a prima facie case exists against the applicant.
- Whether the prosecution is malicious and violative of mandatory provisions of the NDPS Act.
Legislation cited
- Code of Criminal Procedure, 1973 — s. 528
- Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 — s. 20, 29, 8
Subjects
- Section 528 CrPC
- discharge of criminal proceeding
- prima facie case
- malicious prosecution
- NDPS Act
- procedural lapse
- Allahabad High Court
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 42442 of 2026
Amit Tripathi @ Mukund
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P. and Another
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Mohammad Tausif, Vashishtha Naraian
Misra
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय सुरक्षा संहिता के अंतर्गत यह आवेदन पत्र,
मु०अ०सं० 163/2025, अंतर्गत धारा 8/20/29 एन.डी.पी.एस. एक्ट, थाना हांडिया, जिला
इलाहाबाद/प्रयागराज में प्रेषित आरोप पत्र, दिनांकित 21.07.2025 से उद्भूत दाण्डिक वाद सं०
71/2025 (State Vs. Amit), जो ए.डी.जे.-13, इलाहाबाद के न्यायालय में लंबित है, में
पारित प्रसंज्ञान/तलबी आदेश दि० 23.09.2025 तथा इस वाद की संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त
करने हेतु योजित किया गया है।
2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली
का परिशीलन किया।
3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध प्रकट नहीं होता
है और वर्तमान अभियोजन दुर्भावनापूर्ण इरादे से उत्पीड़न करने के उद्देश्य से संस्थित किया
गया है। यहां प्रासंगिक है कि इस मामलें में आवेदक दर्शायी गयी बरामदगी का कोई स्वतंत्र
साक्षी नहीं है और न ही आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास है। आगे यह कथन किया गया है
कि कथित बरामदगी और संपूर्ण कार्रवाई के दौरान संबंधित अधिनियम (Act) के
अनिवार्य एवं वैधानिक प्रावधानों (Mandatory Provisions) तथा नियमों का पालन
नहीं किया गया है, जिससे संपूर्ण प्रक्रिया विधि-विरुद्ध और दूषित हो जाती है। पुनः उनके
विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्कों के समर्थन में पत्रावली पर उपलब्ध महत्वपूर्ण दस्तावेजों
और बयानों की सुसंगत कड़ियों की ओर विशेष रूप से न्यायालय का ध्यान आकर्षित
किया है, जो आवेदक के पक्ष की सत्यता को प्रमाणित करते हैं।
4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने कथन किया कि प्रश्नगत मामलें में समुचित विवेचना के
उपरांत अभियुक्त के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है तथा उस पर संबंधित विचारण
NA528 No. 42442 of 2026
2
न्यायालय द्वारा पर्याप्त आधार पर प्रश्नगत आदेश पारित किया है तथा अभियुक्त के विद्वान
अधिवक्ता द्वारा प्रश्नगत आदेश को अपास्त करने हेतु जो तर्क प्रस्तुत किए गए वे बलहीन है।
5. इस चरण पर, आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उठाए गए तर्क में तथ्यात्मक विवाद का
न्यायिक निर्णय (adjudication) और साक्ष्य का मूल्यांकन (appraisal) शामिल है।
6. उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों एवं अभिलेख पर मौजूद सामग्री के अवलोकन से
और इस चरण पर मामले के तथ्यों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदक के
विरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। बार (न्यायालय) के समक्ष किए गए सभी अभिवचन
(submissions) तथ्य के विवादित प्रश्नों से संबंधित हैं, जिनका इस न्यायालय द्वारा धारा
528 बी.एन.एन.एस. के अंतर्गत न्यायिक निर्णय नहीं किया जा सकता है। इस चरण पर केवल
प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला देखा जाना है, जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
आर.पी. कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1960 एस.सी. 866, हरियाणा राज्य
बनाम भजन लाल, 1992 एससीसी (क्रिमिनल) 426, बिहार राज्य बनाम पी.पी. शर्मा,
1992 एससीसी (क्रिमिनल) 192 और अंत में झंडू फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड बनाम
मोहम्मद शराफुल हक एवं अन्य (पैरा-10) 2005 एससीसी (क्रिमिनल) 283 के मामलों में
प्रतिपादित कानून के आलोक में स्पष्ट किया गया है। इसलिए, इस मामले की संपूर्ण कार्यवाही
को निरस्त करने की प्रार्थना को अस्वीकार किया जाता है।
7. तद्नुसार, यह आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।
8. कार्यालय को निर्देश दिया जाता है कि इस आदेश की एक प्रतिलिपि संबंधित अवर
न्यायालय को अविलम्ब भेजना सुनिश्चित किया जाय।
9. यदि इस वाद में कोई अंतरिम आदेश हो तो, उसे समाप्त समझा जाय।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
October 1, 2026
CP.sahani
Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad
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