Allahabad High Court
PRADIP GAUDversusSTATE OF U.P.
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
In the absence of direct evidence and a dying declaration, anticipatory bail may be granted subject to stringent conditions to prevent evidence tampering or witness intimidation.
Summary
The applicant, Pradip Gaud, filed an anticipatory bail application under Section 108 of the Criminal Procedure Code in connection with FIR No. 561/2024 at Kotwali Hata, Kushinagar. The applicant argued that no direct evidence or dying declaration exists against him, and therefore he should be released on bail pending trial. The State opposed, contending that the applicant’s role in the alleged offence is material and he may tamper with evidence or influence witnesses. Relying on the principles laid down in Siddharam Satlingappa Mhetre v. State of Maharashtra (2011) 1 SCC 694, the court examined the nature of the allegations, the risk of evidence tampering, and the applicant’s cooperation. The court held that anticipatory bail could be granted in the absence of direct evidence, subject to strict conditions, and ordered the applicant to furnish a personal bond of Rs. 50,000 and two sureties of the same amount. The bail was conditioned on the applicant not interfering with the prosecution’s case, appearing before the court as required, and not committing any similar offence.
Issues considered
- Whether anticipatory bail should be granted when there is no direct evidence or dying declaration against the accused.
- Whether the accused poses a risk of tampering with evidence or influencing witnesses, warranting denial of bail.
Legislation cited
- Code of Criminal Procedure, 1973 — s. 108
Subjects
- anticipatory bail
- Section 108 CrPC
- lack of direct evidence
- witness tampering
- personal bond
- conditions of bail
- criminal procedure
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
CRIMINAL MISC. ANTICIPATORY BAIL APPLICATION U/S 482 BNSS No.
- 10317 of 2026
Pradip Gaud
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P.
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Kripesh Mishra
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्ण अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र, आवेदक की ओर से मु०अ०सं०
561/2024 अन्तर्गत धारा 108 भारतीय न्याय संहिता, थाना कोतवाली हाटा, जिला
कुशीनगर में अग्रिम जमानत की मॉग करते हुए इस प्रार्थना के साथ योजित किया गया है
कि गिरफ्तारी की स्थिति में आवेदक को जमानत पर रिहा किया जा सके।
2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा
पत्रावली का परिशीलन किया।
3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि मा० न्यायालय द्वारा इस मामलें
में आवेदक के विरूद्ध कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य न पाये जाने के आधार पर आरोप पत्र दाखिल
किये जाने तक अग्रिम जमानत पर मुक्त किया गया था। वर्तमान में इस मामलें की
विवेचनारांत आवेदक के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है, किंतु आवेदक के
विरूद्ध कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं और न ही कोई मृत्युकालिक बयान है। इसलिए, आवेदक
को विचारण के अंतरिम रूप से निस्तारित होने तक अग्रिम जमानत पर मुक्त कर दिया
जाय। पुनः उनका कथन है कि आवेदक विचारण और जॉच के दौरान सहयोग करने का
वचन देता है कि वह जॉच एजेंसी या न्यायालय द्वारा अपेक्षित समय पर उपस्थित रहेगा
एवं आवेदक की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि वह कानून की प्रक्रिया में सहयोग
करने के लिए तैयार है और जब भी आवश्यकता होगी वह ईमानदारी से न्यायालय के
समक्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन सभी शर्तों को स्वीकार करने के लिए भी तैयार
है, जो न्यायालय उस पर अधिरोपित करेगी।
4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता द्वारा अभियुक्त के अग्रिम जमानत के विरोध में यह
तर्क प्रस्तुत किया गया कि इस मामले में अभियुक्त की भूमिका परिलक्षित हो रही है तथा
इस घटना में उसकी भूमिका संभाव्य है। इसलिए अभियुक्त को अग्रिम जमानत पर मुक्त
न किया जाय।
5. यहां प्रासंगिक तथ्य है कि Siddharam Satlingappa Mhetre vs. State of
Maharashtra, (2011) 1 SCC 694 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
यह अवधारित किया गया है कि अग्रिम जमानत याचिका पर न्याय-निर्णयन करते समय
NABAIL No. 10317 of 2026
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न्यायालय को आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, आरोपी की न्यायिक प्रक्रिया से भागने
की संभावना पर विचार करना चाहिए और यह कि न्यायालय को आरोपी के विरूद्ध
उपलब्ध सभी सामग्री का सावधानी से मूल्यांकन करना चाहिए और आरोपी की
वास्तविक भूमिका पर भी विचार करना चाहिए।
6. उभय पक्ष के तर्को एवं वर्तमान मामले में अग्रिम जमानत संबंधी विधि के स्थापित
सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए और पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं के कथनों, आरोपों
की प्रकृति, आवेदक की भूमिका और मामले के सभी तथ्यों एवं परिस्थितियों को ध्यान
में रखते हुए, मामले के गुण-दोष पर बिना कोई विचार व्यक्त किए अग्रिम जमानत की
प्रार्थना स्वीकार किए जाने योग्य है।
7. तद्नुसार, यह अग्रिम जमानत आवेदन पत्र स्वीकार किया जाता है।
8. उपरोक्त मुकदमा अपराध संख्या में सम्मिलित आवेदक की गिरफ्तारी की दशा में, उसे
संबंधित विचारण न्यायालय की संतुष्टि पर रू० 50,000/- का व्यक्तिगत बंध पत्र एवं
उसी धनराशि के दो प्रतिभू प्रस्तुत करने पर, सत्र परीक्षण/विचारण के निस्तारण होने
तक निम्न शर्तो के अधीन अग्रिम जमानत पर मुक्त किया जाएगा :-
i) आवेदक अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के साथ छे ड़छाड़ नहीं करेगा।
ii) आवेदक अभियोजन पक्ष के गवाहों को धमकाएगा या परेशान नहीं करेगा।
iii) आवेदक विचारण न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रत्येक तिथि पर उपस्थित होगा।
iv) आवेदक उस अपराध के समान कोई अपराध नहीं करेगा, जिसका आरोप आवेदक
पर लगाया गया है या जिसके किए जाने का संदेह है।
v) आवेदक मामले के तथ्यों से परिचित किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगा, जिससे वह व्यक्ति न्यायालय या किसी पुलिस
अधिकारी को तथ्य बताने से विमुख हो जाए या साक्ष्यों के साथ छे ड़छाड़ करें।
9. उपर्युक्त किसी भी शर्त के उल्लंघन की स्थिति में, विचारण न्यायालय कानून के
अनुसार आवेदक की जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
October 1, 2026
CP.sahani
Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad
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