Allahabad High Court
KRISHN JI AND 2 OTHERSversusSTATE OF U.P.
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The anticipatory bail application is dismissed.
Summary
The applicants, Krishn Ji and two others, filed an anticipatory bail application under Section 482 of the CrPC in connection with FIR No. 335/2025 alleging offences under IPC Sections 115(2), 110, 352 and 351(3). The learned court examined the seriousness of the alleged offences, the applicants' role, and the possibility of them fleeing justice. Relying on the principles laid down in Siddharam Satlingappa Mhetre v. State of Maharashtra, the court held that the allegations were serious, the applicants had no prior convictions, but the evidence against them was sufficient to deny bail. Consequently, the anticipatory bail petition was rejected without further discussion on merits. The order was dated 12 May 2026.
Issues considered
- Whether the applicants are entitled to anticipatory bail under Section 482 of the CrPC.
- Whether the alleged offences under IPC Sections 115(2), 110, 352 and 351(3) constitute a serious offence justifying denial of bail.
- Whether there is a likelihood of the applicants fleeing or tampering with evidence.
Legislation cited
- Code of Criminal Procedure, 1973 — s. 482
- Indian Penal Code — s. 110, 115(2), 351(3), 352
Subjects
- anticipatory bail
- Section 482 CrPC
- IPC offences
- bail denial
- high court
- serious offence
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
CRIMINAL MISC. ANTICIPATORY BAIL APPLICATION U/S 482 BNSS No.
- 4050 of 2026
Krishn Ji And 2 Others
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P.
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Santosh Kumar Gupta
Counsel for Opposite Party(s) : G.A., Sanskar Gaur, Uma Shanker
Court No. - 82
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. सूची पुनरीि्षत वतर्मान दािण्डक ्ऺकीणर् अि्षम जमानत ्ऺाथर्ना प्ऴ आवेदकगण कृष्णा
जी, धमर्वीर एवं पीताम्बर की ओर से मु०अ०स० 335/2025 अन्तगर्त धारा 115(2)/ 110,
352, 351(3), बी.एन.एस. थाना बिनयाठे र, िजला सम्भल में अि्षम जमानत पर मु्व करने
हेतु ्ऺस्तुत िकया गया है।
2. आवेदकगण के िव्षान अिधव्वा की तरफ से िव्षान अिधव्वा एवं िव्षान अपर शासकीय
अिधव्वा को सुना तथा प्ऴावली का पिरशीलन िकया।
3. आवेदकगण के िव्षान अिधव्वा ने तकर् ्ऺस्तुत िकया िक आवेदकगण िनदरॏष है, उसे
उपरो्व धाराओं में ्षेषवश तंग व परेशान करने की िनयत से आिलप्त िकया गया है, उसे
आशंका है िक उसे उपरो्व विणत मामले में िगरफ्तार िकया जा सकता है, जबिक उसके िवरू्ध
कोई िव्षसनीय साष्य नहीं है। उनका यह भी कथन है िक आवेदकगण के िवरु्ध अभी तक
कोई भी बाध्यकारी ्ऺि्वया नहीं अपनाई गयी है एवं आवेदकगण की ओर से यह भी आ्षासन
िदया गया है िक वह कानून की ्ऺि्वया में सहयोग करने के िलए तैयार है और जब भी
आवश्यकता होगी वह ईमानदारी से न्यायालय के सम्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन
सभी शतों को स्वीकार करने के िलए भी तैयार है जो न्यायालय उस पर अिधरोिपत करेगी।
4. िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा ्षारा यह तकर् ्ऺस्तुत िकया गया िक अिभयु्व ्षारा कािरत
अपराध गंभीर ्ऺकृित का है तथा आवेदकगण के िवरु्ध पयार्प्त साष्य के आधार पर पुिलस
्षारा आवेदकगण के िवरु्ध संबंिधत िवचारण न्यायालय में आरोपप्ऴ ्ऺेिषत िकया गया है।
इसिलए आवेदकगण को अि्षम जमानत पर मु्व िकये जाने का कोई औिचत्य ्ऺतीत नहीं होता
है। अतः अिभयु्वगण का अि्षम जमानत आवेदन प्ऴ िनरस्त िकया जाय।
5.
NABAIL No. 4050 of 2026
2
यह कहा जा सकता है िक Siddharam Satlingappa Mhetre v. State of
Maharashtra, (2011) 1 SCC 694, के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने माना है
िक अि्षम जमानत पर िनणर्य करते समय न्यायालय को आरोप की ्ऺकृित और गंभीरता,
अिभयु्वगण का पूवर्वृ्त, अिभयु्वगण के न्याय से भागने की संभावना पर िवचार करना
चािहए तथा न्यायालय को अिभयु्वगण के िवरु्ध उपलब्ध संपूणर् साम्षी का सावधानीपूवर्क
मूल्यांकन करना चािहए तथा अिभयु्वगण की सटीक भूिमका को भी ध्यान में रखना चािहए।
6. वतर्मान मामले में अि्षम जमानत संबंधी िविध के स्थािपत िस्धांतों को ध्यान में रखते हुए
और प्षकारों के िव्षान अिधव्वाओं के कथनों, आरोपों की ्ऺकृित, आवेदकगण की भूिमका
और मामले के सभी तथ्यों एवं पिरिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए चूंिक संबंिधत िवचारण
न्यायालय में आवेदकगण के िवरु्ध साष्य पाये जाने के उपरान्त आरोप प्ऴ ्ऺेिषत िकया जा
चुका है, अतः मामले के गुण-दोष पर िबना कोई िवचार ्ि्व िकए यह अि्षम जमानत आवेदन
प्ऴ स्वीकार िकए जाने योग्य नहीं है, त्शुसार आवेदकगण का अि्षम जमानत आवेदन प्ऴ
अस्वीकार िकया जाता है।
7. उपरो्वानुसार वाद के गुण-दोष पर िटप्पणी िकये बगैर यह अि्षम जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ
िनरस्त िकया जाता है।
8. इस वाद में यिद कोई अंतिरम आदेश हो, तो वह स्वतः समाप्त समझा जाए।
9. कायार्लय को िनदरॏिशत िकया जाता है िक इस आदेश की ्ऺितिलिप संबंिधत िवचारण
न्यायालय को अिवलम्ब ्ऺेिषत करें।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
May 12, 2026
S.Mishra
Digitally signed by :-
SHASHI MISHRA
High Court of Judicature at Allahabad
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