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Allahabad High Court

RAJKUMARversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER

Decided

Holding

The anticipatory bail application is dismissed.

Summary

The applicant Rajkumar filed a second anticipatory bail application under Section 482 CrPC in FIR No. 8151/2020 alleging offences under IPC sections 419, 420, 467, 468 and 471. He claimed innocence and asserted that the charges were filed with malice, and offered to cooperate with the investigation. The State opposed, contending that the applicant had previously been granted interim bail on 16‑09‑2025 but had violated its conditions, thereby causing delay in trial and indicating a risk of non‑compliance. Relying on the principles laid down in Siddharam Satlingappa Mhetre v. State of Maharashtra, the court examined the nature and seriousness of the alleged offences, the applicant’s conduct, and the breach of earlier bail conditions. Concluding that the applicant misused the interim bail and that the seriousness of the offences warranted denial, the court dismissed the anticipatory bail application without commenting on the merits of the case.

Issues considered

  • Whether anticipatory bail should be granted under Section 482 CrPC given the nature and seriousness of the alleged offences.
  • Whether the applicant's alleged non‑compliance with earlier interim bail conditions justifies denial of anticipatory bail.
  • Whether the applicant poses a risk of flight, tampering with evidence, or causing delay in trial.

Legislation cited

Subjects

  • anticipatory bail
  • Section 482 CrPC
  • interim bail violation
  • IPC offences
  • flight risk
  • criminal procedure

Judgment

           HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
CRIMINAL MISC. ANTICIPATORY BAIL APPLICATION U/S 482 BNSS No.
                        - 9635 of 2026

Rajkumar
                                                                       .....Applicant(s)
                                          Versus

State of U.P. and Another
                                                                           .....Opposite
                                                                                 Party(s)

Counsel for Applicant(s)      : Garima                 Kumari       Jaiswal,   Pratibha
                                Jaiswal
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.

Court No. - 75
                 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.

1. वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्ण अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र आवेदक राजकुमार की ओर से परिवाद
सं० 8151/2020 अन्तर्गत धारा 419/ 420/ 467/ 468/ 471 भा.दं.सं., थाना पिपरी, जिला
सोनभद्र में अग्रिम जमानत पर मुक्त करने हेतु प्रस्तुत किया गया है।

2. यह आवेदक का द्वितीय अग्रिम जमानत आवेदन पत्र है, प्रथम अग्रिम जमानत आवेदन पत्र
दिनांक 03.04.2026 को अदम पैरवी पर निरस्त कर दिया गया था।

2. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा पत्रावली
का परिशीलन किया।

3. आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि आवेदक निर्दोष है, उसे उपरोक्त
धाराओं में द्वेषवश तंग व परेशान करने की नियत से आलिप्त किया गया है, उसे आशंका है कि
उसे उपरोक्त वर्णित मामले में गिरफ्तार किया जा सकता है, जबकि उसके विरूद्ध कोई
विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है। आवेदक दारा प्राथमिकी में दर्शित उपरोक्त धाराओं का अपराध
कारित नहीं किया गया है। आवेदक की ओर से यह भी आश्वासन दिया गया है कि वह कानून
की प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए तैयार है और जब भी आवश्यकता होगी वह ईमानदारी से
न्यायालय के समक्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन सभी शर्तों को स्वीकार करने के लिए
भी तैयार है जो न्यायालय उस पर अधिरोपित करेगी।

4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि आवेदक को इस
न्यायालय की अन्य न्यायपीठ द्वारा दिनाँक 16.09.2025 को अन्तरिम अग्रिम जमानत कुछ
शर्तों के साथ प्रदान की गयी थी, जिसका आवेदक द्वारा अनुपालन नहीं किया जा रहा है। इस
प्रकार आवेदक द्वारा पूर्व में दिये गये अन्तरिम अग्रिम जमानत एवं जमानत के साथ लगायी गयी
                                                                                                  NABAIL No. 9635 of 2026
                                                                        2


                                    शर्तों का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। जिससे यह परिलक्षित हो रहा है कि जिससे सत्र
                                    परीक्षण के निस्तारण में अनावश्यक विलम्ब हो रहा है। अभियुक्त द्वारा कारित अपराध गंभीर
                                    प्रकृति का है इसलिए आवेदक को अग्रिम जमानत पर मुक्त किये जाने का कोई औचित्य प्रतीत
                                    नहीं होता है अतः अभियुक्त का अग्रिम जमानत आवेदन पत्र निरस्त किया जाय।अभियुक्त द्वारा
                                    कारित अपराध गंभीर प्रकृति का है इसलिए आवेदक को अग्रिम जमानत पर मुक्त किये जाने
                                    का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है अतः अभियुक्त का अग्रिम जमानत आवेदन पत्र निरस्त
                                    किया जाय।

                                    5. यह कहा जा सकता है कि Siddharam Satlingappa Mhetre v. State of
                                    Maharashtra, (2011) 1 SCC 694, के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने माना है
                                    कि अग्रिम जमानत पर निर्णय करते समय न्यायालय को आरोप की प्रकृति और गंभीरता,
                                    अभियुक्त का पूर्ववृत्त, अभियुक्त के न्याय से भागने की संभावना पर विचार करना चाहिए तथा
                                    न्यायालय को अभियुक्त के विरुद्ध उपलब्ध संपूर्ण सामग्री का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना
                                    चाहिए तथा अभियुक्त की सटीक भूमिका को भी ध्यान में रखना चाहिए।

                                    6. वर्तमान मामले में अग्रिम जमानत संबंधी विधि के स्थापित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए
                                    और पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं के कथनों, आरोपों की प्रकृति, आवेदक की भूमिका और
                                    मामले के सभी तथ्यों एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एवं सम्पूर्ण दस्तावेजों के
                                    अवलोकन से यह विदित होता है कि आवेदक द्वारा पूर्व में दिये गये अंतरिम आदेश का दुर्पयोग
                                    किया जा रहा है। अतः मामले के गुण-दोष पर बिना कोई विचार व्यक्त किए यह अग्रिम जमानत
                                    आवेदन पत्र स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है, तद्रुसार आवेदक का अग्रिम जमानत आवेदन पत्र
                                    अस्वीकार किया जाता है।

                                    7. उपरोक्तानुसार वाद के गुण-दोष पर टिप्पणी किये बगैर यह अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र
                                    निरस्त किया जाता है।

                                    8. इस वाद में यदि कोई अंतरिम आदेश हो, तो वह स्वतः समाप्त समझा जाए।

                                    9. आवेदक नियमित जमानत प्रार्थनापत्र दाखिल करने हेतु स्वतंत्र है। कार्यालय को निर्देशित
                                    किया जाता है कि इस आदेश की एक प्रतिलिपि अविलम्ब संबंधित विचारण न्यायालय के
                                    भेजना सुनिश्चित करें।



                                                                                         (Dr. Gautam Chowdhary,J.)
                                    September 23, 2026
                                    S.Mishra




Digitally signed by :-
SHASHI MISHRA
High Court of Judicature at Allahabad


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