Allahabad High Court
RINKI AND ANOTHERversusSTATE OF U.P. AND 3 OTHERS
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The petition is dismissed because the petitioners are not entitled to the relief sought as the alleged prior marriage has not been legally dissolved.
Summary
The petitioners, Rinki and another, filed a writ petition seeking a permanent injunction directing the respondents not to interfere with their live-in relationship and to provide them protection. They asserted that both are adults, have voluntarily cohabited, and face threats from family members, claiming a serious risk to their lives. The respondents, through the State and the C.S.C., contended that one petitioner (Yachi No.1) is still legally married to another person and that no valid divorce has been obtained, rendering the petition untenable. The court examined the documents and found that the alleged prior marriage has not been dissolved in accordance with law, and therefore the petitioners lack legal standing for the relief claimed. Consequently, the court dismissed the petition without further comment.
Issues considered
- Whether a live-in relationship between two consenting adults can be protected by a permanent injunction under Indian law.
- Whether the petitioners are entitled to protection when one of them is allegedly still married and no legal divorce exists.
- Whether the writ petition is maintainable in view of the alleged existing marriage and lack of legal dissolution.
Subjects
- live-in relationship
- permanent injunction
- protection order
- marriage dissolution
- bigamy
- petition dismissed
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
WRIT - C No. - 28101 of 2026
Rinki And Another
.....Petitioner(s)
Versus
State Of U.P. And 3 Others
.....Respondent(s)
Counsel for Petitioner(s) : Mohammad Zunaid Khan, Pulkit, Zaid
Arshad
Counsel for Respondent(s) : C.S.C.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान सी०एस०सी० को सुना तथा पत्रावली का
परिशीलन किया।
2- आदेश दिनांक 23.07.2026 के अनुपालन में आज विद्वान मुख्य स्थायी अधिवक्ता द्वारा
दिशा-निर्देश दाखिल किया गया, जिसे पत्रावली पर "X" के रूप में संलग्न किया जाय।
3- याचीगण की ओर से इस याचिका के माध्यम से, याचीगण एक परमादेश रिट जारी करने
की माँग कर रहे है, जिसमें प्रत्युत्तरदातागण को, याचीगण के पति और पत्नी के रूप में
शान्तिपूर्ण जीवन (लिव इन रिलेशनशिप) में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया जाय तथा
संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गयी है कि वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान
करें।
4- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि याचीगण वयस्क है और उन्होंने
अपनी मर्जी और सहमति से बिना किसी दबाव के एक दूसरे के साथ विवाह कर लिया है और
दोनों पति-पत्नी के रूप में दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर रह रहे हैं, याचीगण ने अपने उम्र के
समर्थन में अपने-अपने हाईस्कू ल का प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि, याचिका के साथ संलग्न किया
है, जिनके अवलोकन से यह स्पष्ट है कि दोनों याचीगण बालिग हैं याचिका में दिए गए कथन
याचीगण के संयुक्त हलफनामों द्वारा समर्थित हैं। इसके अलावा यह भी अनुरोध किया गया है
कि निजी प्रत्युत्तरदाता और परिवार के अन्य सदस्य याचीगण द्वारा किए गए इस विवाह से
नाराज हो गए है और उनके द्वारा याचीगण को धमकी दी जा रही है और उन्हें परेशान किया जा
रहा है जिसके कारण याचीगण के जीवन को गंभीर खतरा है। अग्रिम याचीगण के विद्वान
अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि याची सं० 1 पूर्व में शादीशुदा थी, किन्तु आपसी विचारों
के न मिलने की वजह से उसने अपने पति से स्टाम्प/नोटरी पर तलाक के जरिए अलग हो चुके
हैं एवं एक-दूसरे से कोई वास्ता-सरोकार नहीं है। याची सं० 1 अब याची सं० 2 के साथ रह रही
है तथा याची सं० 2 की पत्नी का भी पूर्व में देहान्त हो चुका है।
WRIC No. 28101 of 2026
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5- विद्वान सी०एस०सी० ने तर्क प्रस्तुत किया कि उनके द्वारा पूर्वादेश के अनुलपान में
आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त किया जा चुका है, जिससे यह स्पष्ट है कि याची सं० 1 की पूर्व में
ही एक अन्य व्यक्ति श्री संजीव पुत्र श्री रामनिवास से शादी हो चुकी है तथा उनके मध्य
विधिनुसार तलाक/विवाह विच्छेद नहीं हुआ है, मात्र स्टाम्प/नोटरी पर आपसी समझौते के
आधार पर अलग रह रहे हैं, जो कि विधि के अनुकूल नहीं है तथा मान्य नहीं है। अन्ततः उन्होंने
अनुरोध किया कि उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्कों को देखते हुए याचीगण वांछित अनुतोष
प्राप्त करने के अधिकारी नहीं है एवं यह याचिका निरस्त किए जाने योग्य है, तद्नुसार याचीगण
की याचिका निरस्त कर दी जाय।
6- पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों एवं विद्वान सी०एस०सी० के तर्कों के परिप्रेक्ष्य में प्रथमदृष्टया
यह परिलक्षित हो रहा है कि याची सं० 1 का विधि-अनुरूप विवाह विच्छेद नहीं हुआ है। अतः
समस्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए एवं पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर
याचीगण को उनके द्वारा वांछित अनुतोष प्रदान किए जाने का कोई औचित्य नहीं है तथा यह
याचिका निरस्त किए जाने योग्य है।
7- तद्नुसार, वाद के गुण दोष पर बिना कोई टिप्पणी किए हुए यह याचिका निरस्त की जाती
है।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
September 23, 2026
Pawan Kumar
Digitally signed by :-
PAWAN KUMAR
High Court of Judicature at Allahabad
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