Allahabad High Court
CHANDRAWATI DEVI @ CHANARAUTAversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER
- Decided
- Bench
- SAURABH SRIVASTAVA
Holding
The High Court quashed the criminal proceedings, holding that the matter is essentially civil and should be dealt with by a competent civil court.
Summary
The applicant, Chandrawati Devi, filed an application under Section 528 of the BNSS seeking to set aside a criminal complaint (Section 316(2) BNSS) filed against her in a criminal case arising from a dispute over Rs 1,00,000 transferred to her bank account. She alleged that the dispute was essentially civil, concerning the recovery of money lent by a village official, and that the criminal proceedings were a misuse of process to harass her. The court examined the facts, noting that the money transaction was a civil matter and that the criminal complaint lacked substantive evidence of an offence. Relying on Supreme Court precedents (A.M. Mohan, G. Sagar Suri, Naresh Kumar, Paramjeet Batra) and the principle that Section 482 CrPC should be used sparingly to prevent abuse of process, the High Court held that the criminal proceedings must be quashed. It directed that the dispute be resolved in a civil money‑recovery suit and set aside the charge‑sheet and related orders. The application under Section 528 was allowed.
Issues considered
- Whether the dispute over the transferred money is of a civil nature and thus not cognizable as a criminal offence.
- Whether the criminal proceedings constitute an abuse of process warranting quash under Section 528 BNSS and Section 482 CrPC.
Legislation cited
- Bihar National Security Act — s. 316(2), 528
- Code of Criminal Procedure — s. 482
Subjects
- criminal procedure
- abuse of process
- Section 528 BNSS
- civil vs criminal jurisdiction
- money recovery
- quash of criminal proceedings
- Section 482 CrPC
- high court jurisdiction
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 34086 of 2026
Chandrawati Devi @ Chanarauta
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P. and Another
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Gopal Das Srivastava
Counsel for Opposite Party(s) : Ajit Kumar Mishra, Atul Kumar Shahi,
G.A.
Court No. - 79
HON'BLE SAURABH SRIVASTAVA, J.
1. आवेदिका के विद्वान अधिवक्ता, विपक्षी सं० 2 के विद्वान अधिवक्ता एवं राज्य की तरफ से
विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।
2. आवेदिका की ओर से धारा 528 बी.एऩ.एस.एस. के अन्तर्गत यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं०
436/2025 से उद्भूत दाण्डिक वाद सं० 478/2026 (State vs. Chandrawati Devi),
अन्तर्गत धारा 316(2) बी.एन.एस., थाना बांसगांव, जिला गोरखपुर, जो विद्वान अपर मुख्य
न्यायिक मजिस्ट्रेट, बांसगांव गोरखपुर के न्यायालय में लम्बित है, में प्रेषित आरोपपत्र दिनांकित
18.09.2025 एवं प्रसंज्ञान/तलबी आदेश दिनांकित 24.03.2026 की कार्यवाही को
अपास्त किये जाने हेतु योजित किया गया है।
3. आवेदिका के विद्वान अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि विपक्षी संख्या 2 द्वारा आवेदिका
को केवल प्रताड़ित करने के उद्देश्य से वर्तमान प्रकरण में झूठा एवं दुर्भावनापूर्ण ढंग से
अभियुक्त बनाया गया है, जबकि आवेदिका द्वारा उक्त आरोपित अपराध कारित नहीं किया गया
है। आवेदिका के विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि प्रस्तुत विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति
का है, विपक्षी संख्या-2 द्वारा उसे सिर्फ अनुचित उद्देश्य से, ब्लैकमेल करने, उत्पीड़ित करने
तथा धन की अवैध वसूली करने के उद्देश्य से वर्तमान मामले में झूठा फँसाया गया है।
वास्तविक तथ्य यह है कि आवेदिका एक अशिक्षित एवं श्रमिक वर्ग से संबंधित महिला है। वह
दैनिक मजदूरी करके अपना एवं अपने परिवार का जीवन-यापन करती है तथा मनरेगा योजना
के अंतर्गत मजदूरी करती रही है। पूर्ववर्ती ग्राम पंचायत चुनाव में अभियोजन साक्षी विकास सिंह
की पत्नी ग्राम प्रधान थीं। विकास सिंह ने ही आवेदिका का बैंक खाता खुलवाने में भी सहायता
की थी, ताकि मनरेगा योजना के अंतर्गत प्राप्त होने वाली मजदूरी की धनराशि उसके खाते में
स्थानांतरित की जा सके। विकास सिंह द्वारा सूचनाकर्ता से उपरोक्त विवादित धनराशि
आवेदिका के बैंक खाते में स्थानांतरित करवा दी। आवेदिका के बैंक खाते का विवरण विकास
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सिंह के पास पूर्ववर्ती ग्राम पंचायत कार्यकाल के दौरान ही उपलब्ध था। उक्त धनराशि
स्थानांतरित किए जाने के पश्चात विकास सिंह ने आवेदिका से संपर्क कर उसे बताया कि उसके
मित्र ने अपनी आवश्यकता के लिए उक्त धनराशि आवेदिका के बैंक खाते में स्थानांतरित की है
और आवेदिका से उक्त धनराशि बैंक से निकालकर उसे नकद रूप में सौंपने के लिए कहा।
अग्रिम आवेदिका के विद्वान अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि आवेदिका द्वारा अपने खाते में
धनराशि रु० 1,00,000/- प्राप्त की गयी थी, किन्तु उसके द्वारा विकास सिंह को उक्त धनराशि
नकद रूप में वापस कर दी गयी है। सूचनाकर्ता किसी दूरस्थ ग्राम का निवासी है तथा आवेदिका
से उसकी जान-पहचान नहीं है। अतः आवेदिका द्वारा उसके घर जाकर उपचार हेतु धनराशि की
मांग किए जाने का कोई अवसर ही उत्पन्न नहीं होता। आवेदिका के विद्वान अधिवक्ता ने आगे
तर्क प्रस्तुत किया कि दीवानी विवाद को आपराधिक रूप प्रदान करते हुए तथा आवेदिका पर
अनुचित दबाव बनाने एवं उसे प्रताड़ित करने के उद्देश्य से विपक्षी संख्या 2 द्वारा उसे वर्तमान
आपराधिक वाद में अभियुक्त बनाया गया है। यह भी कथन किया गया कि कथित घटना के
संबंध में आवेदिका के विरुद्ध ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे उसके विरुद्ध
लगाए गए आरोपों की पुष्टि हो सके। आवेदिका के विद्वान अधिवक्ता ने यह भी तर्क प्रस्तुत
किया कि निष्पक्ष एवं समुचित विवेचना किए बिना ही संबंधित विवेचक द्वारा आवेदिका के
विरुद्ध आरोप-पत्र प्रस्तुत कर दिया गया, जिस पर संबंधित विचारण न्यायालय ने न्यायिक
विवेक का समुचित प्रयोग किए बिना संज्ञान लिया। अतः उक्त कार्यवाही विधि की प्रक्रिया का
दुरुपयोग है और न्यायहित में आरोप-पत्र, संज्ञान आदेश तथा तत्संबंधी समस्त कार्यवाही को
निरस्त किया जाना न्यायोचित है।
4. इसके विपरीत, विपक्षी संख्या 2 के विद्वान अधिवक्ता तथा विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता
ने आवेदिका द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र का प्रबल विरोध करते हुए कथन किया है कि आवेदिका की
ओर से उठाए गए प्रश्न वस्तुतः विवादित तथ्यों से संबंधित हैं, जिनके निराकरण हेतु साक्ष्यों का
मूल्यांकन अपेक्षित होगा। यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि संज्ञान लिये जाने के स्तर पर
न्यायालय द्वारा प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है अथवा नहीं, मात्र इस पर विचार करना होता है
तथा इस स्तर पर न्यायालय से लघु विचारण (Mini Trial) किए जाने की अपेक्षा नहीं की
जाती है।
5. उभयपक्ष के विद्वान अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत परस्पर विरोधी तर्कों पर विचार करने तथा
अभिलेख पर उपलब्ध समस्त साक्ष्यों के अवलोकन के पश्चात् यह स्पष्ट है कि आवेदिका के
विरुद्ध लगाए गए आरोप मूलतः विवादित धनराशि की देयता अथवा वसूली का निर्धारण सक्षम
दीवानी न्यायालय द्वारा किया जाना प्रासंगिक है। उभयपक्ष के मध्य वास्तविक धनराशि के लेन-
देन का विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का है, जिसे आपराधिक रूप प्रदान किया गया है। माननीय
सर्वोच्च न्यायालय ने A.M. Mohan Vs. State Represented by SHO and
another, [2024 SCC OnLine SC 339] के मामले में यह प्रतिपादित किया है कि
विशेष रूप से दीवानी प्रकृति के वाद को आपराधिक प्रकरण में परिवर्तित करने की प्रवृत्ति
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निरंतर बढ़ रही है। इसी प्रकार, G. Sagar Suri Vs. State of U.P., [(2000) 2 SCC
636] के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई निम्नलिखित टिप्पणियां भी इस
संदर्भ में प्रासंगिक हैं, जो निम्नवत् हैं:-
"8. It is to be seen if a matter, which is essentially of a civil nature,
has been given a cloak of criminal offence. Criminal proceedings
are not a short cut of other remedies available in law. Before
issuing process a criminal court has to exercise a great deal of
caution. For the accused it is a serious matter. This Court has laid
certain principles on the basis of which the High Court is to
exercise its jurisdiction under Section 482 of the Code. Jurisdiction
under this section has to be exercised to prevent abuse of the
process of any court or otherwise to secure the ends of justice."
6. इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Naresh Kumar and another Vs.
The State of Karnataka and another, [2024 INSC 196] में पारित निर्णय के
निम्नलिखित अनुच्छे द का उल्लेख करना समीचीन होगा, जिसमें समान परिस्थितियों में निहित
अधिकारिता का प्रयोग किए जाने के संबंध में विधिक स्थिति प्रतिपादित की गई है। जो
निम्नवत् हैः-
"6. In the case of Paramjeet Batra v. State of Uttarakhand (2013)
11 SCC 673, this Court recognized that although the inherent
powers of a High Court under Section 482 of the Code of Criminal
Procedure should be exercised sparingly, yet the High Court must
not hesitate in quashing such criminal proceedings which are
essentially of a civil nature. This is what was held:
"12. While exercising its jurisdiction under Section 482 of the Code
the High Court has to be cautious. This power is to be used
sparingly and only for the purpose of preventing abuse of the
process of any court or otherwise to secure ends of justice. Whether
a complaint discloses a criminal offence or not depends upon the
nature of facts alleged therein. Whether essential ingredients of
criminal offence are present or not has to be judged by the High
Court. A complaint disclosing civil transactions may also have a
criminal texture. But the High Court must see whether a dispute
which is essentially of a civil nature is given a cloak of criminal
offence. In such a situation, if a civil remedy is available and is, in
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fact, adopted as has happened in this case, the High Court should
not hesitate to quash the criminal proceedings to prevent abuse of
process of the court."
7. उपर्युक्त विधिक स्थिति पर इस न्यायालय की समकक्ष न्यायपीठ द्वारा Kamlesh Singh
Vs. State of U.P. and others [(2024) 6 ILRA 15] के मामले में भी निर्णय
प्रतिपादित किया जा चुका है।
8. प्रस्तुत प्रकरण में इस न्यायालय द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा
528 के अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग करते हुए प्रश्नगत आरोप-पत्र तथा उसके आधार पर
पारित संज्ञान/समन आदेश तथा वर्तमान वाद की समस्त कार्यवाही को निरस्त किया जाना
न्यायोचित होगा। चूंकि वर्तमान वाद उभयपक्ष के मध्य पैसों के लेन-देन से संबंधित है तथा
उभयपक्ष के मध्य विवाद मूलतः धनराशि के लेन-देन एवं उसकी वसूली से संबंधित है।
विवादित धनराशि की देयता अथवा वसूली का निर्धारण साक्ष्य के आधार पर सक्षम दीवानी
न्यायालय द्वारा किया जाना अपेक्षित है। अतः धनराशि की वसूली हेतु सक्षम न्यायालय के
समक्ष विवादित धनराशि की वसूली हेतु (Money Recovery Suit) संस्थित किया जाना
उपयुक्त विधिक उपचार होगा। महज धनराशि की वसूली से संबंधित दीवानी वाद को, मात्र
आवेदिका को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से आपराधिक रूप नहीं दिया जा सकता।
9. उपर्युक्त तथ्यों, परिस्थितियों एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि-सिद्धांतों
के आलोक में, मु०अ०सं० 436/2025 से उद्भूत दाण्डिक वाद सं० 478/2026 (State vs.
Chandrawati Devi), अन्तर्गत धारा 316(2) बी.एन.एस., थाना बांसगांव, जिला
गोरखपुर, जो विद्वान अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बांसगांव गोरखपुर के न्यायालय में लम्बित
है, में प्रेषित आरोपपत्र दिनांकित 18.09.2025 एवं प्रसंज्ञान/तलबी आदेश दिनांकित
24.03.2026 की कार्यवाही को अपास्त किया जाता है।
10. तदनुसार, वर्तमान प्रार्थनापत्र अंतर्गत धारा 528 बी.एन.एस.एस. स्वीकार किया जाता है।
(Saurabh Srivastava,J.)
September 28, 2026
Pawan Kumar
Digitally signed by :-
PAWAN KUMAR
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