Allahabad High Court
GARIMA SRIVASTAVA AND ANOTHERversusSTATE OF U.P. AND ANOTHER
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
The court held that a prima facie case exists and therefore dismissed the application under Section 528 CrPC.
Summary
Garima Srivastava and another filed an application under Section 528 of the Criminal Procedure Code seeking to quash FIR No. 470/2025 and the subsequent civil suit No. 5401/2026. They contended that no offence was made out, the prosecution was malicious, and there was no direct evidence against them. The State opposed the application, arguing that the charge sheet had been properly filed and the lower court had sufficient basis for its order. The High Court examined the submissions and held that, on a prima facie basis, an offence could be inferred and the matter could not be dismissed under Section 528. Consequently, the application to quash the proceedings was rejected.
Issues considered
- Whether the FIR and subsequent proceedings should be quashed under Section 528 of the Criminal Procedure Code.
- Whether a prima facie case of offence exists against the applicants.
- Whether the prosecution is malicious and lacks direct evidence.
Legislation cited
- Code of Criminal Procedure, 1973 — s. 528
- Indian Evidence Act, 1872 — s. 137(2), 3(5)
- Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act — s. 81
Subjects
- Section 528 CrPC
- quash of FIR
- malicious prosecution
- prima facie case
- evidence evaluation
- juvenile justice
- Indian Evidence Act
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 36162 of 2026
Garima Srivastava And Another
.....Applicant(s)
Versus
State of U.P. and Another
.....Opposite
Party(s)
Counsel for Applicant(s) : Manoj Kumar Pandey
Counsel for Opposite Party(s) : G.A.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदकगण की ओर से धारा 528 भारतीय सुरक्षा संहिता के अंतर्गत यह आवेदन
पत्र, मु०अ०सं० 470/2025, अंतर्गत धारा 137(2), 3(5) भारतीय न्याय संहिता व धारा
81 जुवेनाइल जस्टिट एक्ट, थाना पनकी, जिला कानपुर नगर में प्रेषित आरोप पत्र, दिनांकित
13.12.2025 से उद्भूत वाद सं० 5401/2026 में अपर सिविल न्यायाधीश (सिनियर
डिवीजन), कोर्ट सं० 1, कानपुर नगर द्वारा पारित तलबी आदेश दि० 28.01.2026 तथा इस
वाद की संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त करने हेतु योजित किया गया है।
2. आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा
पत्रावली का परिशीलन किया।
3. आवेदकगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध प्रकट नहीं
होता है और वर्तमान अभियोजन दुर्भावनापूर्ण इरादे से उत्पीड़न करने के उद्देश्य से संस्थित
किया गया है। यहां प्रासंगिक है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है तथा आवेदकगण का नाम
सहअभियुक्त से बयान के आधार पर प्रकाश में लाया गया है। इसके अतिरिक्त, आवेदकगण के
विरूद्ध कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। पुनः उनके द्वारा अपने तर्क के समर्थन में कुछ दस्तावेजों और
बयानों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
4. विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने कथन किया कि प्रश्नगत मामलें में समुचित विवेचना के
उपरांत अभियुक्तगण के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है तथा उस पर संबंधित
विचारण न्यायालय द्वारा पर्याप्त आधार पर प्रश्नगत आदेश पारित किया है तथा अभियुक्तगण
के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रश्नगत आदेश को अपास्त करने हेतु जो तर्क प्रस्तुत किए गए वे
बलहीन है।
5. इस चरण पर, आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उठाए गए तर्क में तथ्यात्मक विवाद का
न्यायिक निर्णय (adjudication) और साक्ष्य का मूल्यांकन (appraisal) शामिल है।
6. उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों एवं अभिलेख पर मौजूद सामग्री के अवलोकन से
और इस चरण पर मामले के तथ्यों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदकगण के
विरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। बार (न्यायालय) के समक्ष किए गए सभी अभिवचन (
submissions) तथ्य के विवादित प्रश्नों से संबंधित हैं, जिनका इस न्यायालय द्वारा धारा 528
NA528 No. 36162 of 2026
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बी.एन.एन.एस. के अंतर्गत न्यायिक निर्णय नहीं किया जा सकता है। इस चरण पर केवल प्रथम
दृष्टया (prima facie) मामला देखा जाना है, जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा
आर.पी. कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1960 एस.सी. 866, हरियाणा राज्य
बनाम भजन लाल, 1992 एससीसी (क्रिमिनल) 426, बिहार राज्य बनाम पी.पी. शर्मा,
1992 एससीसी (क्रिमिनल) 192 और अंत में झंडू फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड बनाम
मोहम्मद शराफुल हक एवं अन्य (पैरा-10) 2005 एससीसी (क्रिमिनल) 283 के मामलों में
प्रतिपादित कानून के आलोक में स्पष्ट किया गया है। इसलिए, इस मामले की संपूर्ण कार्यवाही
को निरस्त करने की प्रार्थना को अस्वीकार किया जाता है।
7. तद्नुसार, यह आवेदन पत्र निरस्त किया जाता है।
8. कार्यालय को निर्देश दिया जाता है कि इस आदेश की एक प्रतिलिपि संबंधित अवर
न्यायालय को अविलम्ब भेजना सुनिश्चित किया जाय।
9. यदि इस वाद में कोई अंतरिम आदेश हो तो, उसे समाप्त समझा जाय।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
September 8, 2026
CP.sahani
Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad
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