Created by Fuzzy Cloud

Allahabad High Court

KHUSHNUMA AND ANOTHERversusSTATE OF U.P. AND 3 OTHERS

Decided

Holding

Adult individuals have a constitutionally protected right to cohabit in a live‑in relationship, and the State must safeguard that right, warranting a permanent injunction.

Summary

The petitioners, two adult women in a live‑in relationship, approached the Allahabad High Court seeking a permanent injunction directing the State and police not to interfere with their peaceful cohabitation and to provide them protection against threats from family members. The petition arose after one petitioner was reported missing, later clarified as having voluntarily left home to live with the other petitioner. The court noted that both are adults, unmarried, and have chosen to live together, and that no criminal offence has been alleged. Relying on the earlier decision in RIT‑35171/2025 and the constitutional guarantee of life and personal liberty under Article 21, the court held that the state must protect this right. Consequently, the court issued a permanent injunction ordering the police to ensure their safety and not to obstruct their relationship, subject to verification of age and absence of any criminal case.

Issues considered

  • Whether an adult's right to live together in a live‑in relationship is protected under Article 21 of the Constitution.
  • Whether the High Court can, under Article 226, issue a permanent injunction directing the police not to interfere with such a relationship.
  • Whether the State has a constitutional duty to protect the petitioners from family‑derived threats.

Legislation cited

Subjects

  • live‑in relationship
  • right to life
  • personal liberty
  • Article 21
  • injunction
  • police protection
  • adult autonomy
  • constitutional law

Judgment

           HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
                             WRIT - C No. - 14982 of 2026

Khushnuma And Another
                                                                       .....Petitioner(s)
                                          Versus

State Of U.P. And 3 Others
                                                                     .....Respondent(s)

Counsel for Petitioner(s)                                     :   Amrita Singh
Counsel for Respondent(s)                                     :   C.S.C.

Court No. - 75
                 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.

1- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान स्थायी अधिवक्ता को सुना एवं पत्रावली का
परिशीलन किया।
2- याचीगण की ओर से इस याचिका के माध्यम से, याचीगण एक परमादेश रिट जारी करने
की मांग कर रहे हैं, जिसमें प्रत्युत्तरदातागण को याचीगण के शांतिपूर्ण जीवन (लिव इन
रिलेशनशिप) में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया जाए एवं संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश
देने की मांग की गयी है कि वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान करें।

3- याचीगण द्वारा मा० न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत सिविल मिस० रिट पिटीशन नं०-
14982/2026 में प्रश्नगत प्रकरण में याचीकर्ता सं0-01 की माता अन्सारी बेगम द्वारा
याचीकर्ता सं0-01 के अचानक घर से गयाब हो जाने के आधार पर दिनांक 18/04/2026
को जीडी सं-54 समय 13.32 बजे थाना किच्छा जनपद उधम सिंह नगर उत्तराखण्ड पर
गुमशुदगी सं-17/26 दर्ज किया गया था उसके उपरान्त दिनांक 29/05/2026 को
मु0अ0सं0- 187/2026 धारा 140 (3) बीएनएस थाना किच्छा जिला उधम सिंह नगर
उत्तराखण्ड में प्र०सू०रि० में तरमीम की गयी। दौरान विवेचना गुमशुदा/याचीकर्ता सं0-01 ने
बताया कि वह अपनी मर्जी से अमन/ याचीकर्ता सं0-02 के साथ आ गयी है, उससे विवाह कर
चुकी है तथा उसी के साथ रहना चाहती है। इस आधार पर प्रश्नगत अभियोग में कोई भी
अपराध कारित न होने के आधार पर अन्तिम रिपोर्ट प्रेषित कर विवेचना समाप्त कर दी गयी है।

4- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता का कथन है कि दोनों याचीगण बालिग हैं। वे अविवाहित हैं
और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। उक्त के अतिरिक्त यह भी कथन किया गया है कि निजी
प्रतिवाद और परिवार के अन्य सदस्य नाराज हो गए हैं और उनके जीवन को गंभीर खतरा है
क्योंकि उन्हें धमकी दी जा रही है और परेशान किया जा रहा है। इसलिए, याचिकाकर्ताओं ने
निजी प्रतिवादियों से अपने जीवन की रक्षा के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करने के
लिए भारत के संविधान के अनुच्छे द 226 के तहत यह रिट याचिका दायर की है।
                                                                WRIC No. 14982 of 2026
                                    2

5- वर्तमान याचिका में उल्लेखित मामले पर पूर्व में ही रिट-सी संख्या 35171/2025 (
आकांक्षा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और तीन अन्य), निर्णय दिनांकित
17.12.2025 को आदेश पारित किया जा चुका है। वर्तमान मामले के तथ्य उल्लेखित
याचिका के समान हैं। इसलिए वर्तमान रिट याचिका का निपटारा निम्नानुसार किया जा रहा है
6- एक बार जब कोई व्यक्ति, जो वयस्क है, अपना जीवनसाथी चुन लेता है, तो किसी अन्य
व्यक्ति, चाहे वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, को आपत्ति करने और उनके शांतिपूर्ण जीवन
में बाधा डालने का अधिकार नहीं है। राज्य का यह कर्तव्य है, जैसा कि उन पर संवैधानिक
दायित्वों के अनुसार सौंपा गया है, कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा
करे। मानव जीवन के अधिकार को बहुत उच्च स्थान दिया जाना चाहिए, चाहे नागरिक नाबालिग
हो या वयस्क, विवाहित हो या अविवाहित। याचीगण द्वारा विवाह संपन्न न होने से उन्हें भारत
के संविधान में निहित मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे भारत के
नागरिक हैं। न्यायालय यह मानने में कोई संकोच नहीं करता कि भारत के संविधान के अनुच्छे द
21 के अंतर्गत प्राप्त मौलिक अधिकार का विशेष महत्व है। यह पवित्र अधिकार है और
संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत विवाह संपन्न होने या न होने की स्थिति में भी इसकी रक्षा की
जानी चाहिए।
7- चूंकि याचीगण जो बालिग हैं, ने विवाह की पवित्रता के बिना एक साथ रहने का निर्णय
लिया है और उनके इस निर्णय पर न्यायालयों का कोई अधिकार नहीं है। यदि याचिकाकर्ताओं
ने कोई अपराध नहीं किया है, तो न्यायालय को उनकी सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना को
स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं दिखता।
8- अतः मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय का यह मत है कि
याचीगण को शांतिपूर्वक एक साथ रहने की स्वतंत्रता है और किसी को भी उनके शांतिपूर्ण
जीवन में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जीवन का अधिकार संविधान के अनुच्छे द
21 के तहत सुनिश्चित एक मौलिक अधिकार है, जिसमें यह प्रावधान है कि किसी भी व्यक्ति को
उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा
किसी अन्य तरीके से वंचित नहीं किया जाएगा।

9- यदि याचीगण के शांतिपूर्ण जीवन में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो याचीगण
इस आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ संबंधित पुलिस आयुक्त/एसएसपी/एसपी से संपर्क करेंगे
और पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करने के बाद कि याचीगण वयस्क हैं और स्वेच्छा से एक
साथ रह रहे हैं, याचीगण को तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे। यदि याचीगण शिक्षित हैं और वे
अपने शैक्षणिक प्रमाण पत्र और कानून के तहत मान्य अन्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत करते हैं, जिनसे
यह स्पष्ट होता है कि वे वयस्क हैं और अपनी मर्जी से रह रहे हैं, तो कोई भी पुलिस अधिकारी
उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगा, जब तक कि उनके खिलाफ किसी भी
अपराध के संबंध में एफ.आई.आर. दर्ज न हो। यदि उनके पास आयु संबंधी कोई दस्तावेजी
                                                                                                    WRIC No. 14982 of 2026
                                                                        3


                                    प्रमाण नहीं है और वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और/या निरक्षर/अर्ध-साक्षर हैं, तो पुलिस
                                    अधिकारी उनकी सही उम्र का पता लगाने के लिए उनका ऑसिफिकेशन टेस्ट करवा सकता है
                                    और कानून के अंतर्गत प्रदत्त दूसरी प्रक्रियाओं का भी पालन कर सकता है।

                                    10- उपरोक्त दिशा-निर्देशों के साथ वर्तमान याचिका निस्तारित की जाती है।


                                                                                         (Dr. Gautam Chowdhary,J.)
                                    September 9, 2026
                                    S.Mishra




Digitally signed by :-
SHASHI MISHRA
High Court of Judicature at Allahabad


Continue reading with your account

Sign in to read the full judgment. It’s free.

Sign in to read

Checking your session…

For a signed copy suitable for filing, refer to the court's website.