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Allahabad High Court

UNITED INDIA INSURANCE COMPANY LIMITEDversusPERMANENT LOK ADALAT AND 2 OTHERS

Decided

Holding

A Permanent Lok Adalat cannot decide a dispute on merits without first undertaking a genuine conciliation process as mandated by Section 22(g) of the Legal Services Authority Act, 1987; failure to do so renders its order void.

Summary

The petition challenged an order of the Permanent Lok Adalat (PLA) in Ghaziabad that resolved an insurance dispute without conducting the statutory conciliation process under Section 22(g) of the Legal Services Authority Act, 1987. The petitioner argued that the PLA merely made a generic reference to conciliation and did not record any genuine effort to achieve a settlement, contrary to the requirements laid down in earlier judgments. The Court examined the provisions of the Act, emphasizing that a PLA must first attempt a bona‑fide settlement and only if that fails may it decide the case on merits. Citing the Manager Life Insurance Corporation of India v. PLA, Basti decision and other precedents, the Court held that the PLA’s order was legally insufficient and therefore void. Consequently, the impugned order dated 17‑03‑2026 was set aside and the matter remitted to the PLA to conduct a proper conciliation process before any adjudication. The writ petition was disposed of.

Issues considered

  • Did the Permanent Lok Adalat comply with the mandatory conciliation procedure under Section 22(g) of the Legal Services Authority Act, 1987?
  • Can an order of a Permanent Lok Adalat be set aside for non‑compliance with the statutory conciliation requirement?
  • Is the writ petition seeking interference with the PLA order maintainable?

Legislation cited

Subjects

  • Legal Services Authority Act
  • Permanent Lok Adalat
  • Section 22(g)
  • conciliation
  • writ petition
  • set aside
  • remand
  • insurance dispute

Judgment

          HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
                              WRIT - C No. - 36592 of 2026

United India Insurance Company Limited
                                                                               .....Petitioner(s)
                                             Versus

Permanent Lok Adalat And 2 Others
                                                                            .....Respondent(s)

Counsel for Petitioner(s)                                     :     Anubhav Sinha
Counsel for Respondent(s)                                     :


Court No. - 36
             HON'BLE SAURABH SHYAM SHAMSHERY, J.

1. Heard Sri Anubhav Sinha, learned counsel for the petitioner and Sri

Shyam Singh, learned Standing Counsel for State-Respondents.


2. It has been rightly pointed out by learned counsel for petitioner that

requirement for process of conciliation as provided under Section 22-C of

Legal Services Authority Act, 1987, was not carried out by Permanent

Lok Adalat in impugned order, except a general reference which is not

sufficient as held by this Court in the case of Manager Life Insurance

Corporation of India, Basti vs. Permanent Lok Adalat, Basti and

others, 2021:AHC:151400 and relevant paragraphs of the judgment are

reproduced hereinafter:

     “6. विश्लेषण


     (क) वर्तमान प्रकरण में उत्पन्न विधिक प्रश्न, जिसका उल्लेख इस निर्णय के प्रस्तर 1 में किया
     गया है, उस पर दोनों पक्षों की बहस के मद्देनजर, निर्णय लेने के लिये, सर्वप्रथम विधिक सेवा
     प्राधिकरण अधिनियम1983, के अधिनियमित करने के उद्देश्य का उल्लेख करना अति
     आवश्यक है, जो निम्नलिखित है-


     “समाज के दुर्बल वर्गों को निःशुल्क और सक्षम विधिक सेवा यह सुनिश्चित करने हेतु उपलब्ध
     कराने के लिए कि आर्थिक या अन्य निर्योग्यताओं के कारण कोई भी नागिरक न्याय पाने के
                                                                      WRIC No. 36592 of 2026
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अवसर से वंचित न रह जाए, विधिक सेवा प्राधिकरणों का गठन करने के लिए और यह
सुनिश्चित करने हेतु कि विधिक पद्धति के प्रवर्तन से समान अवसर के आधार पर न्याय का
संवधर्न हो, लोक अदालतें संगिठत करने के लिए अधिनियम”


(ख) उपरोक्त उद्देश्य की प्राप्ति के हेतू 'लोक अदालतों के आयोजन’ का प्रावधान उक्त
अधिनियम के अध्याय 6 में किया गया है। अध्याय 6क, के धारा 22 (ख) की उपधारा (1) में '
स्थायी लोक अदालत' की स्थापना का प्रावधान है। 'लोक अदालत’ व ’स्थायी लोक अदालत’
में एक महत्वपूर्ण बुनियादी अंतर है। जहाँ लोक अदालत पक्षकारों के बीच समझौता या
परिनिर्धारण करने का प्रयास करेगा और यदि ऐसा न हो पाये तो वाद विधि के अनुसार निपटाने
के लिये लौटा दिया जायेगा। (देखे उक्त अधिनियम की धारा 20 व उसकी उपधारा) परन्तु उक्त
अधिनियम की धारा 22 ग के अनुसार 'स्थायी लोक अदालत’ मामलों का संज्ञान लेने के
उपरान्त सर्वप्रथम पक्षकारों के बीच सुलह कार्यवाही करेगी और स्वतंत्र और निष्पक्ष रीति से
सौहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुँचने के लिए, पक्षकारों के प्रयास में सहायता करेगी। परन्तु यदि
पक्षकार किसी करार पर पहुंचने में असफल रहते हैं और यदि विवाद किसी अपराध से संबधि
                                                                             ं त
नहीं है, उस दशा में ही स्थाई लोक अदालत विवाद का विनिश्चय कर सकती है (देखे उक्त
अधिनियम की धारा-22 (ख) व उसकी उपधारा)


(ग) सुलभता के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1983 की धारा 22 ग व उसकी
सभी उपधारा निम्न उल्लेखित की जा रही है।


“22 ग. स्थायी लोक अदालत द्वारा मामलों का संज्ञान-


(1) किसी विवाद का कोई पक्षकार, विवाद को किसी न्यायालय के समक्ष लाने से पूर्व, विवाद
के निपटारे के लिए स्थायी लोक अदालत को आवेदन कर सकेगा परन्तु स्थायी लोक अदालत
को ऐसे अपराध से, जो किसी विधि के अधीन शमनीय नहीं है, संबधि
                                                        ं त किसी विषय के संबंध
में कोई अधिकारिता नहीं होगी परन्तु यह और कि स्थायी लोक अदालत को ऐसे मामले में भी
अधिकारिता नहीं होगी जिसमें वादग्रस्त संपत्ति का मूल्य दस लाख रुपए से अधिक है परन्तु यह
भी कि केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, केन्द्रीय प्राधिकरण से परामर्श करके दूसरे
परंतुक में विनिर्दिष्ट दस लाख रुपए की सीमा को बढ़ा सकेगी।


(2) स्थायी लोक अदालत को उपधारा (1) के अधीन आवेदन किए जाने के पश्चात्, उस
आवेदन का कोई पक्षकार उसी विवाद के लिए किसी न्यायालय की अधिकारिता का अवलंब
नहीं लेगा।


(3) जहां किसी स्थायी लोक अदालत को उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया जाता है
वहां वह,-
                                                                       WRIC No. 36592 of 2026
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क) आवेदन के प्रत्येक पक्षकार को उसके समक्ष लिखित कथन फाइल करने का निर्देश देगी
जिसमें आवेदन के अधीन विवाद के तथ्यों और प्रकृति, ऐसे विवाद के मुद्दों या विवाद्यकों और,
यथास्थिति, ऐसे मुद्दों या विवाद्यकों के समथर्न में या उसके विरोध में अवलंबित आधारों का
कथन होगा और ऐसा पक्षकार ऐसे कथन की अनुपर्ति
                                       ू में ऐसा कोई दस्तावेज या अन्य साक्ष्य दे
सकेगा जिसे ऐसा पक्षकार ऐसे तथ्यों और आधारों के सबूत में समुचित समझता है और ऐसे
कथन की एक प्रति ऐसे दस्तावेज या अन्य साक्ष्य, यदि कोई हो, के साथ आवेदन के प्रत्येक
पक्षकार को भेजेगी;


(ख) आवेदन के किसी पक्षकार से सुलह कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर उसके समक्ष
अतिरिक्त कथन फाइल करने की अपेक्षा कर सकेगी;


(ग) आवेदन के किसी पक्षकार से, उसे प्राप्त किसी दस्तावेज या कथन को, अन्य पक्षकार को,
उसका उत्तर देने के लिए समर्थ बनाने हेतु संसचि
                                           ू त करेगी ।


(4) जब कोई कथन, अतिरिक्त कथन और उत्तर, यदि कोई हो, उपधारा (3) के अधीन स्थायी
लोक अदालत के समाधानप्रद रूप में फाइल किया गया है तब वह आवेदन के पक्षकारों के बीच
सुलह कार्यवाहियां ऐसी रीति से करेगी जिसे वह विवाद की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए
उचित समझे।


(5) स्थायी लोक अदालत उपधारा (4) के अधीन सुलह कार्यवाहियां करने के दौरान पक्षकारों
को विवाद के स्वतंत्र और निष्पक्ष रीति में सौहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुंचने के लिए, उनके प्रयास
में सहायता करेगी।


(6) आवेदन के प्रत्येक पक्षकार का यह कर्तव्य होगा कि वह आवेदन से संबधि
                                                                   ं त विवाद की
सुलह कराने में स्थायी लोक अदालत के साथ सद्भावनापूर्वक सहयोग करे और स्थायी लोक
अदालत के, उसके समक्ष साक्ष्य और अन्य संबधि
                                        ं त दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश का
अनुपालन करे।


(7) जब स्थायी लोक अदालत की पूर्वोक्त सुलह कार्यवाहियों में यह राय है कि ऐसी
कार्यवाहियों में समझौते के ऐसे तत्व विद्यमान हैं जो पक्षकारों को स्वीकार्य हो सकें गे, तब वह
विवाद के संभाव्य समझौते के निबंधन विरचित कर सकेगी और संबधि
                                                        ं त पक्षकार को उनके
संप्रेक्षण के लिए देगी और यदि पक्षकार विवाद के समझौते के लिए सहमत हो जाते हैं तो वे
समझौता करार पर हस्ताक्षर करेंगे तथा स्थायी लोक अदालत उसके निबंधनानुसार अधिनिर्णय
पारित करेगी और उसकी एक-एक प्रति प्रत्येक संबंधित पक्षकार को देगी।


(8) जहां पक्षकार उपधारा (7) के अधीन किसी करार पर पहुंचने में असफल रहते हैं, वहां यदि
                                                                   WRIC No. 36592 of 2026
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विवाद किसी अपराध से संबधि
                       ं त नहीं है तो स्थायी लोक अदालत, विवाद का विनिश्चय कर
देगी।”


(घ) इस उच्च न्यायालय की एक समवर्ती न्यायपीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य प्रति श्रीमती कामिनी
देवी व अन्य; 2017 (9) ए.डी.जे. 44, के निर्णय में अन्य उच्च न्यायालयों के कई निर्णयों को
आधार मानते हुए यह निर्धारित किया कि स्थाई लोक अदालत का यह एक पवित्र कर्तव्य है कि
, वो अपनी बुद्धिमत्ता, ज्ञान व अनुभव का सद्प्रयोग करते हुए पक्षकारों के मध्य समझौता करने
का भरसक प्रयास करेंगे और ऐसे प्रयासों में असफल होने की दशा में ही विवाद का विनिश्चिय
गुण-दोष पर कर सकें गे। समझौते की प्रक्रिया को किये बिना स्थाई लोक अदालत सीधे गुण-
दोष पर निर्णय नहीं दे सकते हैं।


(ङ) इस न्यायालय की एक और समवर्ती न्यायपीठ ने नेशनल इंश्योरेन्स कं0 लि0 प्रति स्थाई
लोक अदालत (रिट सी नं0 34170/2012 निर्णय तिथि 02.05.2014) में प्रतिपादित किया है
कि-


“वो सभी मामले जो इस न्यायालय के समक्ष आते हैं, निरअपवाद रुप से न्यायालय यह पाया
जाता है कि भले ही अधिनियम की धारा- 22 ग की उप-धारा (5) और उप-धारा (6), स्थायी
लोक अदालत, पर सुलह की कार्यवाही के दौरान समझौता कराने का दायित्व होता है और फिर
उप-धारा (7) के संदर्भ में एक राय बनाना होता हैं, कि ऐसी कार्यवाही में समझौते के तत्व
मौजूद हैं, जो पक्षकार को स्वीकार्य हो सकते हैं, तो संभावित समझौते के निबन्धन विचरित कर
सकते हैं और पक्षकारों से टिप्पणियां आमंत्रित की जा सकती है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है
कि स्थायी लोक अदालतें, उक्त वैधानिक प्रावधानों के पुर्णत्य विपरीत में गुण-दोष के आधार पर
इस मुद्दे पर निर्णय लेने से पहले केवल "समाधान का प्रयास किया परन्तु विफल रहा” का पाठ
कर रही है। इस बारे में कोई सामग्री नहीं है कि यह सुलह कब की गयी, किस तरीके से और
किस तरह से समझौते की शर्ते तैयार की गई ताकि संबधि
                                               ं त पक्षों की टिप्पणियां आमंत्रित की
जा सकें । यह न तो प्रावधान की भावना है और न ही इसे सार्वजनिक उपयोगिता सेवा प्रदाता में
शामिल करने के लिए एक छल के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कोई
औपचारिकता नहीं है, जिसे यंत्रवत् रुप से निर्वहन किया जाना है। पत्रावली से यह प्रतिबिंबित
होना चाहिए कि एक संभावित समझौते तक पहुँचने के लिये, एक प्रस्तावित समझौता बनाने के
लिए वास्तविक और ईमानदार प्रयास किये गये थे और केवल जब प्रस्तावित समझौते को
वांछित प्रतिक्रिया नहीं मिलती है, तब ही स्थायी लोक अदालत को गुण-दोष के आधार पर
निर्णय लेने के लिये आगे बढ़ना चाहिए।” (अनुवाद न्यायालय द्वारा किया गया है)


(च) इसके अतिरिक्त एक और समवर्ती न्यायपीठ द्वारा लाइफ इंश्योरेन्स कॉरपोरेशन ऑफ
इंडिया प्रति सैयद जैइघम व अन्य; 2015 (8) एडीजे 668, के मामले में इस संदर्भ में स्थाई
                                                                           WRIC No. 36592 of 2026
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लोक अदालतों को कुछ दिशा निर्देश भी दिये गये थे, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वो दिशा
निर्देश स्थाई लोक अदालतों द्वारा पूर्ण रुप से अपनाये नहीं जा रहे हैं। प्रमुख निर्देश हैं कि


“स्थाई लोक अदालत का मुख्य कार्य परिनिधारण कराना है परन्तु पक्षकार जब किसी करार
तक नहीं पहुँच पाते हैं तब स्थाई लोक अदालत न्याय निर्णायक निकाय में रुपान्तरित हो जाता
है” तथा "स्थाई लोक अदालत को विवाद के पक्षकारों को यह धारणा नहीं बनाने देना चाहिये
कि, आरम्भ से ही उसका कार्य न्याय निर्णायक का है” (अनुवाद न्यायालय द्वारा किया गया है)


(छ) जैसा कि उक्त अधिनियम की धारा 22 ग की उपधारा 3 व 4 में वर्णित है, कि पक्षकारों के
लिखित कथन व विवाद के मुद्दों के विवाधकों को ध्यान में रखते हुए, पक्षकारों की बीच स्थाई
लोक अदालत, सुलह कार्यवाहियां द्वारा पक्षकारों को विवाद के स्वंतत्र और निष्पक्ष रीति में
सौहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुँचने के लिए उनके प्रयास में सहायता करेगी। अतः यह आवश्यक है
कि स्थाई लोक अदालत, उक्त प्रयासों का संक्षेप में अपने आदेश में उल्लेख करे क्योंकि
उपधारा (8) के अनुसार यदि पक्षकार किसी करार पर पहुँचने से असफल रहते हैं, उस दशा में
ही, स्थायी लोक अदालत विवाद का विनिश्चय कर सकती हैं (यदि विवाद किसी अपराध से
संबधि
   ं त नहीं है)। उपधारा (8) तक की स्थिति तक पहुँचने से पहले उपधारा (3), (4), (5) व (
6) में किये गये प्रयास व उपधारा (7) में समझौते पर न पहुँचने की स्थिति के उपरान्त ही,
स्थाई लोक अदालत, उपधारा (8) के अन्तर्गत गुण-दोष पर निर्णय ले सकती है। अतः उक्त
कार्यवाही का उल्लेख, संक्षिप्त में ही सही, परन्तु अवश्य होना चाहिये।


(ज) उपरोक्त विश्लेषण से यह पूर्णतः विदित होता है कि, स्थाई लोक अदालत, को सर्वप्रथम
पक्षकारों को सौहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुँचाने के लिये अपनी बुद्धिमत्ता, ज्ञान व अनुभव का
उपयोग करके प्रयास करना चाहिए। जो उसका सर्वप्रथम कर्तव्य है। इस प्रयास में असफल
होने के उपरान्त ही विवाद का विनिश्चय करना चाहिये। परन्तु उपरोक्त कार्यवाहियों का उल्लेख (
संक्षेप में) पंचाट में अवश्य होना चाहिए, जिसमें उसके द्वारा विवाद का विनिश्चय करने का
कारण पता चल सके। ऐसा उल्लेखित न होने से यह प्रतीत होगा कि स्थाई लोक अदालत, द्वारा
पक्षकारों के बीच समझौता कराने का कोई प्रयास नहीं किया गया, जो उक्त अधिनियम के
प्रावधानों का हनन करने के समकक्ष होगा। अतः ऐसी दशा में 'पंचाट’ विधिक रुप से मान्य नहीं
माना जायेगा। प्रकरण में उत्पन्न विधिक प्रश्न का निर्धारण उपरोक्त वर्णन द्वारा किया जाता है।


(झ) वर्तमान प्रकरण में पंचाट में समझौते के प्रयास के संबंध में कोई उल्लेख नहीं किया गया
है, केवल एक स्थान पर समझौते के लिए तारीख निर्धारित की गयी, ऐसा उल्लेखित है, परन्तु
उक्त तारीख पर क्या प्रयास किये गये व क्यों पक्षकार समझौता नहीं कर पाये, ऐसा कुछ भी
नहीं लिखा गया है। अतः यह प्रतीत होता है 'स्थाई लोक अदालत' ने सौहार्द्रपूर्ण समझौते के
लिए कोई भी प्रयास नहीं किया होगा या युक्ति युक्त प्रयास की कमी रही होगी तथा वो सीधे
                                                                         WRIC No. 36592 of 2026
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     विवाद में विनिश्चय की स्थिति पर पहुँच गये जो, उपरोक्त विश्लेषण के पूर्णतः विपरीत है। अतः
     आक्षेपित पंचाट इसी कारणवश, अविधिक व दूषित हो जाता है। क्यों कि यह न्यायालय इस
     निष्कर्ष पर पहुँचता है कि स्थाई लोक अदालत द्वारा समझौते की प्रक्रिया का प्रयास किये बिना
     विवाद पर गुण-दोष पर निर्णय देना अवैधानिक है, अतः इस स्तर पर पंचाट की गुण-दोष पर
     जाँच करने की आवश्यकता नहीं है।


     7. निष्कर्ष


     उपरोक्त विश्लेषण के फलस्वरुप, आक्षेपित 'पंचाट' निरस्त किया जाता है तथा वाद 'स्थाई
     लोक अदालत' को प्रतिप्रेषित किया जाता है और निर्देशित किया जाता है कि वो समझौता
     कराने की प्रक्रिया को अपना कर पक्षकारों के मध्य सुलह कराने का युक्तियुक्त प्रयास करेगी व
     उसके असफल होने के उपरांत ही वाद का गुण-दोष पर विनिश्चय करेगी तथा समझौते के
     प्रयास असफल होने का संक्षेप में उल्लेख पंचाट में भी करेगी। उपरोक्त निर्देश के साथ यह
     याचिका आंशिक रुप से स्वीकार की जाती है।"


3. Learned Standing Counsel appearing for State-Respondents is not able

to dispute the above referred position of law as well as consideration

made by Permanent Lok Adalat which was not sufficient, therefore, Court

finds that a case for interference is made out.


4. In the present case, only consideration made by Permanent Lok Adalat,

as reiterated in impugned order, is as follows:

     "पक्षकारों के मध्य सुलह-समझौते के अनेकों प्रयास किए गए। विपक्षी सं0-01 द्वारा
     प्रार्थनापत्र कागज स0-64ग प्रस्तुत कर समझौते के लिये तैयार न होने का कथन किया गया है
     तथा विपक्षी सं0-02 के द्वारा भी प्रार्थनापत्र कागज स0-67ग प्रस्तुत कर कथन किया गया है
     कि वादी एवं प्रतिवादी सं0-2 के मध्य कोई समझौता वार्ता सम्भव नहीं है और ना कोई
     सम्भावना है तथा उक्त प्रार्थनापत्रों में विपक्षीगण ने प्रस्तुत वाद को गुण-दोष पर निस्तारित
     करने का अनुरोध किया है। उभयपक्षकारों के मध्य समझौता वार्ता न होने कारण तथा
     उभयपक्षकारों के द्वारा वाद को गुण-दोष के आधार पर निस्तारित किये जाने के अनुरोध पर
     न्यायालय द्वारा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा-22ग की उपधारा-7 में
     उल्लिखित प्राविधान एवं माननीय उच्चतम न्यायालय, नई दिल्ली द्वारा सिविल अपील सं०
     -3872/2022 केनरा बैंक बनाम जी.एस. जयरामा में पारित विधि व्यवस्था के अनुसार प्रस्तुत
     वाद में समझौते के सम्भाव्य निबन्धन विरचित किये गये, किन्तु विपक्षी सं0-01 बीमा कम्पनी
                                                                                                         WRIC No. 36592 of 2026
                                                                           7


                                         की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष प्रार्थनापत्र कागज सं0-74ग प्रस्तुत कर
                                         समझौते करने में असमर्थता प्रकट की है।


                                         उभयपक्ष के मध्य समझौते किये जाने में असमर्थता व्यक्त किये जाने के कारण तथा वाद को
                                         गुण-दोष पर सुने जाने के अनुरोध पर प्रस्तुत वाद को गुण-दोष पर निस्तारित किया जाना ही
                                         न्यायसंगत है।"


                                    5. Court finds that aforesaid consideration is not legally sufficient,

                                    therefore, impugned order dated 17.03.2026 passed in P.L.A. Case No. 64

                                    of 2017 by Permanent Lok Adalat, Ghaziabad is set aside and matter is

                                    remitted to concerned respondent to pass a fresh order taking note of

                                    aforesaid judgment in Manager Life Insurance Corporation of India,

                                    Basti (supra).


                                    6. The writ petition is accordingly disposed of.


                                                                                         (Saurabh Shyam Shamshery,J.)
                                    September 14, 2026
                                    AK




Digitally signed by :-
AWADESH KUMAR
High Court of Judicature at Allahabad


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