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Allahabad High Court

NEHA YADAV AND ANOTHERversusSTATE OF U.P. AND 3 OTHERS

Decided

Holding

Adult consensual live‑in relationships are protected by the fundamental right to life and personal liberty under Article 21, and the State must provide police protection against unlawful interference.

Summary

Petitioners Neha Yadav and another, both adult unmarried individuals in a live‑in relationship, alleged threats and harassment from family members and sought a protection order under Article 226 of the Constitution. The petitioners argued that their right to live together peacefully is a facet of the fundamental right to life and personal liberty under Article 21. The Court noted a prior decision (RIT‑सी No.35171/2025, Akanksha v. State of U.P.) with identical facts and held that no one, including family members, can lawfully interfere with the consensual cohabitation of adults. It affirmed that the State has a constitutional duty to protect such rights and directed the police to provide immediate protection, subject to verification of age and voluntary cohabitation. The order directs police officers to refrain from any punitive action unless a criminal FIR is lodged, and the petition was disposed with the protection order granted.

Issues considered

  • Whether adult unmarried individuals in a live‑in relationship are entitled to protection under Article 21 of the Constitution.
  • Whether the High Court can issue a direction under Article 226 directing police to safeguard the petitioners' peaceful cohabitation.
  • Whether the earlier judgment (RIT‑सी No.35171/2025) is binding on the present petition.

Legislation cited

Subjects

  • live-in relationship
  • right to life
  • fundamental rights
  • protection order
  • police protection
  • adult autonomy
  • constitutional law

Judgment

           HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
                             WRIT - C No. - 38572 of 2026

Neha Yadav And Another
                                                                     .....Petitioner(s)
                                          Versus

State Of U.P. And 3 Others
                                                                   .....Respondent(s)

Counsel for Petitioner(s)                                 :   Lakshmi Devi
Counsel for Respondent(s)                                 :   C.S.C.

Court No. - 75
                 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.

1- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान स्थायी अधिवक्ता को सुना एवं पत्रावली का
परिशीलन किया।
2- याचीगण की ओर से इस याचिका के माध्यम से, याचीगण एक परमादेश रिट जारी करने
की मांग कर रहे हैं, जिसमें प्रत्युत्तरदातागण को याचीगण के शांतिपूर्ण जीवन (लिव इन
रिलेशनशिप) में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया जाए एवं संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश
देने की मांग की गयी है कि वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान करें।
3- याचीगण के विद्वान अधिवक्ता का कथन है कि दोनों याचीगण बालिग हैं। वे अविवाहित हैं
और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। उक्त के अतिरिक्त यह भी कथन किया गया है कि निजी
प्रतिवाद और परिवार के अन्य सदस्य नाराज हो गए हैं और उनके जीवन को गंभीर खतरा है
क्योंकि उन्हें धमकी दी जा रही है और परेशान किया जा रहा है। इसलिए, याचिकाकर्ताओं ने
निजी प्रतिवादियों से अपने जीवन की रक्षा के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करने के
लिए भारत के संविधान के अनुच्छे द 226 के तहत यह रिट याचिका दायर की है।
4- वर्तमान याचिका में उल्लेखित मामले पर पूर्व में ही रिट-सी संख्या 35171/2025 (
आकांक्षा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और तीन अन्य), निर्णय दिनांकित
17.12.2025 को आदेश पारित किया जा चुका है। वर्तमान मामले के तथ्य उल्लेखित
याचिका के समान हैं। इसलिए वर्तमान रिट याचिका का निपटारा निम्नानुसार किया जा रहा है
5- यदि कोई व्यक्ति, जो वयस्क है, अपना जीवनसाथी चुन लेता है, तो किसी अन्य व्यक्ति, चाहे
वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, को आपत्ति करने और उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा
डालने का अधिकार नहीं है। राज्य का यह कर्तव्य है, जैसा कि उन पर संवैधानिक दायित्वों के
अनुसार सौंपा गया है, कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे। मानव
जीवन के अधिकार को बहुत उच्च स्थान दिया जाना चाहिए, चाहे नागरिक नाबालिग हो या
वयस्क, विवाहित हो या अविवाहित। याचीगण द्वारा विवाह संपन्न न होने से उन्हें भारत के
संविधान में निहित मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे भारत के
                                                                                                    WRIC No. 38572 of 2026
                                                                        2

                                    नागरिक हैं। न्यायालय यह मानने में कोई संकोच नहीं करता कि भारत के संविधान के अनुच्छे द
                                    21 के अंतर्गत प्राप्त मौलिक अधिकार का विशेष महत्व है। यह पवित्र अधिकार है और
                                    संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत विवाह संपन्न होने या न होने की स्थिति में भी इसकी रक्षा की
                                    जानी चाहिए।
                                    6- चूंकि याचीगण जो बालिग हैं, ने विवाह की पवित्रता के बिना एक साथ रहने का निर्णय
                                    लिया है और उनके इस निर्णय पर न्यायालयों का कोई अधिकार नहीं है। यदि याचिकाकर्ताओं
                                    ने कोई अपराध नहीं किया है, तो न्यायालय को उनकी सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना को
                                    स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं दिखता।
                                    7- अतः मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय का यह मत है कि
                                    याचीगण को शांतिपूर्वक एक साथ रहने की स्वतंत्रता है और किसी को भी उनके शांतिपूर्ण
                                    जीवन में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जीवन का अधिकार संविधान के अनुच्छे द
                                    21 के तहत सुनिश्चित एक मौलिक अधिकार है, जिसमें यह प्रावधान है कि किसी भी व्यक्ति को
                                    उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा
                                    किसी अन्य तरीके से वंचित नहीं किया जाएगा।

                                    8- यदि याचीगण के शांतिपूर्ण जीवन में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो याचीगण
                                    इस आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ संबंधित पुलिस आयुक्त/एसएसपी/एसपी से संपर्क करेंगे
                                    और पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करने के बाद कि याचीगण वयस्क हैं और स्वेच्छा से एक
                                    साथ रह रहे हैं, याचीगण को तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे। यदि याचीगण शिक्षित हैं और वे
                                    अपने शैक्षणिक प्रमाण पत्र और कानून के तहत मान्य अन्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत करते हैं, जिनसे
                                    यह स्पष्ट होता है कि वे वयस्क हैं और अपनी मर्जी से रह रहे हैं, तो कोई भी पुलिस अधिकारी
                                    उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगा, जब तक कि उनके खिलाफ किसी भी
                                    अपराध के संबंध में एफ.आई.आर. दर्ज न हो। यदि उनके पास आयु संबंधी कोई दस्तावेजी
                                    प्रमाण नहीं है और वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और/या निरक्षर/अर्ध-साक्षर हैं, तो पुलिस
                                    अधिकारी उनकी सही उम्र का पता लगाने के लिए उनका ऑसिफिकेशन टेस्ट करवा सकता है
                                    और कानून के अंतर्गत प्रदत्त दूसरी प्रक्रियाओं का भी पालन कर सकता है।

                                    9- उपरोक्त दिशा-निर्देशों के साथ वर्तमान याचिका निस्तारित की जाती है।


                                                                                         (Dr. Gautam Chowdhary,J.)
                                    September 24, 2026
                                    CP.sahani




Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad


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