Allahabad High Court
ZINAT AND ANOTHERversusSTATE OF U.P. AND 3 OTHERS
- Decided
- Bench
- GAUTAM CHOWDHARY
Holding
Adult's right to cohabit in a live-in relationship is protected under Article 21, and the State must provide police protection, leading to the grant of the petition.
Summary
The petitioners, Zinat and another adult, are in a live-in relationship across different religions and face threats and intimidation from family members. They filed a writ petition under Article 226 of the Constitution seeking a protection order directing the respondents, the State of Uttar Pradesh and others, not to interfere with their peaceful cohabitation and to provide police protection. The court noted that a similar matter (Nuri & Others v. State of U.P.) had already granted protection to inter‑religious live‑in couples. Relying on Article 21, the court held that adult individuals have a fundamental right to choose their partner and to live together without unlawful interference, and that the State has a duty to safeguard this right. Consequently, the court ordered the police to ensure the petitioners' safety and dismissed any objection to the relief. The petition was disposed with the protection order granted.
Issues considered
- Whether adult individuals in a live-in relationship have a fundamental right to cohabit without family interference under Article 21 of the Constitution.
- Whether the High Court can issue a protection order under Article 226 directing police to provide security to such individuals.
- Whether the precedent set in Nuri & Others v. State of U.P. is applicable to the present case.
Legislation cited
- Constitution of India — s. Article 21, Article 226
Subjects
- live-in relationship
- right to life
- Article 21
- protection order
- police protection
- inter-religious couple
- fundamental rights
- Article 226
- family interference
Judgment
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
WRIT - C No. - 39397 of 2026
Zinat And Another
.....Petitioner(s)
Versus
State Of U.P. And 3 Others
.....Respondent(s)
Counsel for Petitioner(s) : Dhiranjan Singh Patel
Counsel for Respondent(s) : C.S.C.
Court No. - 75
HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. याचिकाकर्ताओं के विद्वान अधिवक्ता, विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता को सुना तथा
पत्रावली का परिशीलन किया।
2. इस याचिका के माध्यम से याचिकाकर्ताओं ने एक परमादेश रिट जारी करने की मांग की है
जिसमें प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाए कि वे याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में
पति-पत्नी के रूप में हस्तक्षेप न करें और साथ ही संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं को
सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।
3. याचिकाकर्ताओं के विद्वान अधिवक्ता ने बताया है कि यद्यपि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं,
लेकिन वे अलग-अलग धर्मों के हैं। वे अविवाहित हैं और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं।
इसके अलावा, यह भी बताया गया है कि निजी प्रतिवादी और परिवार के अन्य सदस्य नाराज हैं
और उन्हें धमकी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनके जीवन को गंभीर
खतरा है। इसलिए, याचिकाकर्ताओं ने निजी प्रतिवादियों से अपने जीवन की रक्षा के लिए
पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करने हेतु भारत के संविधान के अनुच्छे द 226 के तहत
यह रिट याचिका दायर की है।
4. विद्वान अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने रिट याचिका में की गई प्रार्थना का विरोध किया
है।
5. वर्तमान याचिका में शामिल मामला पहले ही रिट याचिका संख्या 41127/2025 (नूरी और
अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य), 2026 एससीसी ऑनलाइन ऑल 456 में निपटाया
जा चुका है, जिसमें इस न्यायालय की एक समन्वय पीठ ने समान प्रकृति की कई रिट
याचिकाओं को स्वीकार करते हुए, अलग-अलग धर्मों के उन याचिकाकर्ताओं को संरक्षण दिया
था जो अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे। इसके अलावा,
WRIC No. 39397 of 2026
2
वर्तमान मामले के तथ्य नूरी और अन्य (उपरोक्त) के तथ्यों के समान हैं, इसलिए वर्तमान रिट
याचिका का निपटारा निम्नलिखित शर्तों के अनुसार किया जा रहा है।
6. यदि कोई वयस्क व्यक्ति अपना जीवनसाथी चुन लेता है, तो किसी अन्य व्यक्ति, चाहे वह
परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, को आपत्ति करने या उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने
का अधिकार नहीं है। संविधान द्वारा प्रदत्त दायित्वों के अनुसार, राज्य का यह परम कर्तव्य है कि
वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे। मानव जीवन के अधिकार को
सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, चाहे नागरिक नाबालिग हो या वयस्क, विवाहित हो या
अविवाहित। केवल इस तथ्य से कि याचिकाकर्ताओं ने विवाह संपन्न नहीं किया है, उन्हें भारत
के नागरिक होने के नाते भारत के संविधान में परिकल्पित उनके मौलिक अधिकार से वंचित
नहीं किया जा सकता। न्यायालय द्वारा यह भी कथन किया गया कि भारत के संविधान के
अनुच्छे द 21 के अंतर्गत संवैधानिक मौलिक अधिकार सर्वोच्च प्राथमिकता रखता है। पवित्र
होने के नाते, संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत इसकी रक्षा की जानी चाहिए, चाहे पक्षों के बीच
विवाह संपन्न हुआ हो या न हुआ हो।
7. याचिकाकर्ता, जो की बालिग हैं, ने विवाह के बिना एक साथ रहने का निर्णय लिया है और
उनके इस निर्णय पर न्यायालयों का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। यदि याचिकाकर्ताओं ने कोई
अपराध नहीं किया है, तो न्यायालय को उनकी सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना को स्वीकार न
करने का कोई कारण नहीं दिखता।
8. मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय का यह मत है कि
याचिकाकर्ताओं को शांतिपूर्वक एक साथ रहने की स्वतंत्रता है और किसी को भी उनके
शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जीवन का अधिकार संविधान के
अनुच्छे द 21 के तहत सुनिश्चित एक मौलिक अधिकार है, जिसमें यह प्रावधान है कि किसी भी
व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया
के अलावा किसी अन्य तरीके से वंचित नहीं किया जाएगा।
9. यदि याचिकाकर्ता के शांतिपूर्ण जीवन में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो
याचिकाकर्ता इस आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ संबंधित पुलिस आयुक्त/एसएसपी/एसपी
से संपर्क करेंगे। पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करने के बाद कि याचिकाकर्ता वयस्क हैं और
स्वेच्छा से एक साथ रह रहे हैं, उन्हें तत्काल सुरक्षा प्रदान करेगा। यदि याचिकाकर्ता शिक्षित हैं
और वे अपने शैक्षणिक प्रमाण पत्र और कानून के तहत मान्य अन्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत करते हैं,
जिनसे यह स्पष्ट होता है कि वे वयस्क हैं और अपनी मर्जी से रह रहे हैं, तो कोई भी पुलिस
अधिकारी उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगा, जब तक कि उनके खिलाफ
किसी भी अपराध के संबंध में एफ.आई.आर. दर्ज न हो जाए। यदि उनके पास आयु संबंधी
WRIC No. 39397 of 2026
3
कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है और वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और/या निरक्षर/अर्ध-साक्षर हैं,
तो पुलिस अधिकारी उनकी सही आयु सत्यापित करने के लिए अस्थि-परीक्षण करा सकता है
और कानून के तहत अनुमत अन्य प्रक्रियाओं का भी पालन कर सकता है।
10. उपरोक्त टिप्पणियों/निर्देशों के साथ, यह याचिका निस्तारित की जाती है।
(Dr. Gautam Chowdhary,J.)
September 30, 2026
CP.sahani
Digitally signed by :-
CHANDRA PRAKASH SAHANI
High Court of Judicature at Allahabad
Checking your session…